#ठेठ_पलामू : खलिहान
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कुछ धुँधली तस्वीरें बचपन की
जब आँखों के सामने घूम गई
गाँव घर की सुनहरी यादें
मन को भीतर तक झकझोर गईं
सर्दियों के दिन हमें तभी तो भाते थे
जब पुआल पर खेलने के दिन आते थे
खेत खलिहान की तस्वीर भेजी किसी ने
और घूम गया आँखों के सामने
बचपन में पूआल पर खेलना
हाथ पैर में खुजली होना
तेल लगाने से और भी ज्यादा होना
नये- नये स्वेटर मे भूसी घुस जाना
भोरम-भोर पूरा के ढेर में ओस खोजना
शकर-पाला की अपनी ही मिठास घोलना
मुँह से धुआं निकाल निकाल कर बोलना
चौराहों पर बुजुर्गों के साथ अलाव सेंकना
पगडंडी पर टायर घुमाते हुए रेंगना
कुरहा मे छुप छुप के कुछ कुछ खेलना
दवाही की प्रक्रिया को चाव से देखना
गोल गोल घूमते हुए दुनिया के दांव पेच परखना
बोझा ढोने में हाथ बंटा कर खुद को बड़ा होता समझना
काश कि होती कोई मशीन जो समय को मोड़ देती
मुझे फिर से बचपन के उसी खलिहान में छोड़ देती!

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