#ठेठ_पलामू:- गोईंठा
कुछ दिन पहिले एगो ऑनलाईन कंपनी को सर्च कर रहे थे, तो पता चला कि अब चिपरी( गोईंठा ) भी ऑनलाइन कंपनी बेच रही है। 199 रुपया में नौ पीस गोईठा..। अब गाँव-घर में लोग इ सब देखेगा-सुनेगा तो चेहरा में मुस्कुराहट तो आएगा ही...। अब का है कि आपन संस्कृति से जुड़ल लोग के पहुँच अब देश-विदेश सब जगह में हो ही गया है।अब मान लिया जाए कि आदमी को लिट्टी-चोखा खाने का मन कर रहा है आऊ उ भी गोइठा में पका के...तो आदमी पैसा थोड़े ही देखता है।
वैसे हमारे गाँव तरफ इसको #चिपरी कहते हैं। इहे चिपरी को कोई गोईंठा कहता है,कोई गोहरी तो कोई उपला।अब हम जैसे लोग, चाहे गाँव में रहें या शहर में हमारे यहाँ तो बचपन से गाय-भैंस पालने का ही रिवाज रहा है।हमारे गाँव के घर के किनारे वाले ईंट के लाल रंग वाली दीवार का रंग भी चिपरी के रंग जैसा हो गया था। भगवान के दया से हमारे यहाँ काफी संख्या में गाय, बैल और भैंस रहते थे, इसलिए चिपरी ज्यादा हो जाता था।तब उसको #पटवट पर रख दिया जाता था, जो बरसात के मौसम में रसोई में, रहरेठ के साथ जलावन के काम में आता था।
वैसे देश के हर जगह में इ चिपरी का साइज और आकार-प्रकार भी बदलते रहता है। कहीं रोटी जइसन तो कहीं गेंदा नियन। अउर इसको बनाने का तरीका भी अलग-अलग है। कहीं ठोंका जाता है तो कहीं पाथा जाता है। कहीं बीच में कोयला डालकर तो कहीं लकड़ी का बुरादा मिलाकर बनाया जाता है। अउर गाय-भैस का चीज है, तो इसमें गेहूँ का भूसा दिखना स्वाभाविक है।
शुरु से हमारे गाँव-घर में जलावन के लिए लकड़ी मिलना बहुते मुश्किल रहा है। पूर्वजों के आशीर्वाद से डाल्टनगंज तरफ जंगल तो दिखता ही नहीं है। ऐसे समय में इसका भैल्यू (वेल्यू)बहुत बढ़ जाता है। जैसे पहिले के समय में लकड़हारा लोग जंगल से सुखल लकड़ी काटके जलावन के लिए बेचता था, वसे ही लंबे समय तक हमारे तरफ गोईठा बेचना भी रोजगार का साधन रहा है। इससे सबसे बड़ा फायदा यह रहता था कि लकड़ी के जगह इसके इस्तेमाल से पर्यावरण संतुलन भी बना रहता है और दूसरा कि अमेरिका और खाड़ी देशों के रोज के मनमुटाव की वजह से (महंगाई) एलपीजी सिलेंडर को मैंटेन करना सबके बस की बात भी नहीं रहता है। इसलिए हमारे तरफ लगभग सभी रसोई में इसकी उपलब्धता हमेशा बनी रहती थी और आज भी बहुत हद तक कायम है।
नयका जमाना में आज बहुते मॉर्डन लोग को अब गाय के गोबर से बदबू आता है। इसीलिए चिपरी पाथना/पारना अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। आज तक सोशल मीडिया पर चिपरी की कहानी अउर चिपरी के साथ किसी का सेल्फी देखें हैं??यह नदारद दिखलाई पड़ता है। सही बात तो ये है कि समय बदलते रहता है।समय के साथ परंपराएँ भी बदलती रहती हैं। अब के पढ़ल-लिखल युवा पीढ़ी में गोइठा पारने की परंपरा लगभग विलुप्ति के कगार में पहुँच चुकी है।
ये बात भी सही है कि आज के व्यस्त और आरामदायक जिंदगी में अब घर-घर में एलपीजी सिलेंडर की पहुँच हो गयी है। वर्तमान सरकार की भी यह महत्वाकांक्षी योजना भी है। इसलिए आजकल तो शहर-महानगरों में इसको खोजना और "गोइठा में घीव सुखाना" एक जैसा हो गया है। लेकिन गाँव के एलपीजी सिलेंडर वाले घर की दीवारों में आज भी चिपरी से सनी दीवार दिखलाई पड़ती है। काहे कि चिपरी( गोईंठा ) के आंच में देशज भोजन के स्वाद को भुलाना मुश्किल है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आज बाजारवाद का समय है। जिन चीजों को हम देहात की, पिछड़ी और उपेक्षित वस्तु समझ कर तेजी से आगे बढ़ते जा रहे हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उसकी उपयोगिता को समझकर अपने आकर्षक विज्ञापन से उसी चीज को एक समय के बाद हमको ही बहुत महँगे दर पर बेचती हैं;जैसे- दोना-पत्तल और कुल्हड़ के बाद अब चिपरी भी उनकी महत्वाकांक्षी परियोजना में शामिल हो चुका है।
अब छठ महापर्व भी आनेवाला है तो चिपरी(गोईंठा) की बिक्री अमेजन, फ्लिपकार्ट और स्नैपडील जैसी बड़ी ऑनलाईन कंपनियों में शुरू हो गई है। एक्सचेंज, कैशबैक और एक के साथ एक फ्री जैसे लुभावने ऑफर भी आ रहे हैं। ऐसे समय में इस पोस्ट को पढ़ने के बाद आप इसकी और ऐसी तमाम चीजों की महत्ता समझ में आए, जिसे हम पीछे छोड़ चुके हैं। नहीं तो पचास-सौ वर्ष बाद आनेवाली पीढ़ियाँ इन चीजों के लिए विदेशों पर निर्भर हो जाएँगी और आज जो पीढ़ी इसको देखकर नाक भौं सिकोड़ती हैं, कल इसके साथ सेल्फी पोस्ट करके अपनी परंपराओं का दिखावा करेगी।
@Divya Rani
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