#ठेठ_पलामू:- मटका के दाल
जबसे #प्लास्टिक के कप बंद हुआ है न तब से बहुत जगह माटी के कप वाला चाय ट्रेंड कर रहा था। इहाँ तक कि सब घरे भी माटी के #कपटी में चाय बना के वीडियो फ़ोटो चमका रहे थे। भारतीय रेल भी " मिट्टी की खुशबू " कह-कह के पूरा प्रचार किया इसका। और करे भी काहे नहीं आईटम ही ऐसा है अगर #मिजाज से बढ़िया अदरक,इलायची डाल के #औंऊटॉवल दूध के चाय अगर माटी के कपटी में मिल जाये तो समझिये कि पिये वाला तो बैठे-बैठे आशीर्वाद के बाढ़ लगा दे। मने कहिए न तो माटी के बर्तन में कुछु बना दीजिए उसका अलगे ही टेस्ट है। #नॉनभेज खाये वाला से मटका वाला मटन के हाल पूछ लीजिये अपने बता देंगे । आज के टाईम में बहुत जगह रोड किनारे #ढाबा दोकान में लिखल मिल जाएगा। खैर नवरात्रि छठ के टाईम है अभी ई सब बात नही करेंगे।
तब आख़िर माटी के बर्तन में इतना टेस्टी लगबे करता है तो सब इसको यूज काहे नहीं करते हैं । तो फूटने का डर, मिलेगा कहां, अब ग़रीब हैं का! जे माटी के बर्तन में बनाएंगे जैसा बड़ी बहाना मिलेगा। लेकिन पहिले के ज़माने में हर घर में खाना माटीये के बर्तन में बनता था। फूल, पीतर(पीतल), काँसा के बर्तन भी उपयोग होता था, इसका फायदा इसका अगला लेख में करेंगे। तो हाँ, कहाँ थे माटी के बर्तन में। अब जइसे कौनो पुरान चीज के ईयाद पड़ते सब कैसे ओकरे में खो जाते हैं या कभी-कभी वही सब पुरान चीज के लिए कैसे मन करने लगता है। तो वही हुआ हमरो घरे।
अब दादी ई सब के समय मे घरे दुनो बर्तन रहता था पर ज्यादा तर #कच्ची_खाना बनाने के लिए #मटिये के बर्तन के उपयोग होता था। तो अब हमीन के तो उ वाला बर्तन में खाने का नसीब कभी हुआ नहीं तो अब हमीन का जाने ओकर स्वाद। पर #बाबूजी के तो बचपन से खाये के आदत था तो माई से कहे कि - "अगे मटका के बनल दाल खायला बड़ी मन करईत बा बनाइबे का।"
अब माई बोली कि- " बनावेला कौन बड़का बात बा लेक़िन माटी के मटका मिली तब न। देखईत ही रखले तो हली छठ वाला अगर लईकन ना फोडले होइहन तो होइबे करी।"
अब ई न हमर माई के आदत है पता न दादी से सीखी की नानी से सीखी काहे कि दुनो के आदत था कि कुछु समान फेंकते नहीं थे। मने भले ओकर कौनो यूज़ रहे चाहे न रहे ओकरा रख देना है।
अब खोजा गया तो मिल गया जबीत से रखल था तो मिलना ही था। अब लकड़ी वाला चूल्हा नहीं तो बने कहां? गैस में, चाहे #हीटर में इहे दु गो उपाय था । तब हीटर में उसको बनाया गया और का बताये खाये के मौका तो घरे जाने के बाद मिलेगा पर सुने की एकदम मस्त बना था। सिझ भी गया पूरा उपरे से माटी वाला सुगन्ध आउ उपरे से घीव से छनका दिए से आऊ #आफ़त। बाबूजी मन से खाये लईकन भी घरे के सब टेस्ट किया । बहिन तो फ़ोन में बड़ाई अलगे कहे कि - जामल दिन से आज तक अईसन दाल कहिनो खइलीन्हि ना हलियऊ भईया। एकदम मिज़ाज खुश हो गेलऊ।"
ओकर बाद तो दु तीन दिन बना और समझिये कि अब ई घरे के मीनू में परमानेंट आईटम हो गया है।
ई तो रहा टेस्ट का बात गूगल पर जाइये आऊ माटी के बर्तन के फायदा जानिए तब पता चलेगा कि खाली टेस्ट ही नहीं और केतना फायदा है माटी के बर्तन में खाना पकाने से। अब सब घरे हइये हैं , कहीं जाना ऊना है हइये नहीं। खोजिये घरे कहीं कुछ ढकनी-चुका मिल जाये छठ पूजा वाला । बहुत के घर तो आझे छठ खत्म होगा तो उ लोग भी फेंकियेगा मत। रखिएगा और जब मन करे तब बनाईये और मिट्टी के स्वाद में खो जाइये।
अब कहिएगा न ई खाली खाये पिये के आईटम ही बताते रहता है तो उनलोगों के लिए एके बात कहेंगे कि - आदमी घर एके बार न जन्म लिये हैं काहे ला खाहीं पिहिं ला न। का पता अगला जन्म में कुत्ता बिलार की साँप चमगादड़ घर जन्म लेंगे। खायला तो छोड़ दीजिए का मिलेगा से अलगे बात है , इसका कौन गारंटी है कहीं चीन दन जन्म लिए तो उ लोग आपको ही खा के दुनिया भर के जीना हराम कर दे । इसलिए घरे रहिये , मस्ती से खाइये आऊ माटी के गुण गाइये।
@Anand keshaw

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