#ठेठ_पलामू:- सिलौट-लोरहा (सिलबट्टा)
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एक जमाना था, जब गाँव में सभी परंपरागत चीजें आसानी से सुलभ हो जाती थीं। समय के साथ-साथ परंपराएँ भी बदल रही हैं और बहुत सारी परंपरागत चीजें भी तेजी से अप्रासंगिक भी हो रही हैं, जिसमें एक प्रमुख नाम है -'सिलबट्टा'।
जी हाँ, एक जमाने में यह हमारे घर के आँगन की शोभा हुआ करती थी, किंतु 'मिक्सी' के आगमन के बाद आजकल शहर के अधिकांश घरों में यह न के बराबर दिखाई पड़ती है। वैसे गाँव के अधिकांश घरों मे आज भी इसका वर्चस्व कायम है, किन्तु वहाँ भी मिक्सी तेजी से अपनी पहुँच बना रही है।
जब घर में सब्जी के लिए मसाला तैयार करना हो, चटनी बनाना हो, धुसका बनाना हो, पपड़ी बनाना हो, या कोई भी घरेलू विशेष व्यंजन, उसे बनाने में बिना #सिलबट्टा के स्वादिष्ट खाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। सभी अनुभवी लोगों का कहना है कि मिक्सी की बजाए सिलबट्टे के प्रयोग से बनाया गया खाना बेहद स्वादिष्ट रहता है, क्योंकि यह ज्यादा सूक्ष्म न होकर दरदरा होता है।
यही कारण है कि आयुर्वेद-विज्ञान में भी इसके प्रयोग की सलाह दी जाती है, क्योंकि इससे वात विकार नहीं होता और मनुष्य स्वस्थ रहता है। आज भी प्रसिद्ध ढ़ाबों, बड़े-बड़े होटलों, यहाँ तक कि पाँचसितारा होटलों में भी खाने के अनूठे स्वाद के लिए सिलबट्टा में पीसे गए मसालों का प्रयोग किया जाता है।
#भारतवर्ष में सिलबट्टे का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। भारतवर्ष में आज भी धार्मिक यज्ञ और घर के शादी-ब्याह के संस्कारों में सिलबट्टे का पारंपरिक प्रयोग अनिवार्य होता है। माना जाता है कि मानव जब से सभ्य हुआ होगा तभी से सिलबट्टे का अविष्कार हुआ होगा। मिश्र की सभ्यता हो या #सिंधु_घाटी की सभ्यता, सभी में सिलबट्टा होने का प्रमाण मिला है। अब तो विभिन्न शोधपत्रों से यह प्रमाणित हो चुका है कि दुनिया में जितनी भी प्राचीन संस्कृतियाँ हैं, वहाँ पर सिलबट्टा मौजूद रहा है।
बदलते दौर में आजकल बड़े-बड़े शहरों में गाँव और गाँव की चीजों की लगातार प्रदर्शनी लगती रहती है, क्योंकि भले आप जितने बड़े शहर में रह रहे हों, कहीं-न-कहीं आपकी जड़ें गाँव से जुड़ी रहती है। चाहे गीत-संगीत हो, भोजन या लोकसंस्कृति के विविध रुप, यह आपको हमेशा लुभाती है।इसीलिए महानगरों में पारंपरिक भोजन परोसने में '#चौकी_धानी' का नाम आपने सुना ही होगा। जहाँ सभी वर्ग के लोग बहुत रुचि के साथ उस पारंपरिक भोजन का स्वाद लेने आते हैंं, जिसे वह अपने गाँव-घर में छोड़ आए थें।
आज बड़े-बड़े विद्वान और डॉक्टर भी गाँव की उन चीजों की खासियत बताते हैं, जिसे हम सुविधा भोगी लोग बहुत पीछे छोड़ आए हैं। उसमें सिलबट्टा भी एक है, जिसके बिना हम पारंपरिक भोजन के स्वाद को महसूस नहीं कर पाएँगे।
उम्मीद है इस पोस्ट को पढ़कर वे सौभाग्यशाली लोग तो बहुत खुश होंगे जिनके आँगन/रसोई में आज भी सिलबट्टा मौजूद है, लेकिन बड़े शहर और महानगरों में रहने वाले लोगों को भी अफसोस करने की कोई जरुरत नहीं, क्योंकि 'जहाँ चाह है वहाँ राह'।आप चाहें तो कोई-न-कोई रास्ता जरूर निकल जाएगा और जल्द ही आपको सिलबट्टे के प्रयोग से बने स्वादिष्ट खाने का आनंद मिलने वाला है। बस अपने घर में माताजी, बहनें और हमारी भाभी जी को अपनी परंपराओं के प्रति जागृत कीजिए और उनके श्रम और उनकी हाथ से बने हुए स्वाद की जी खोलकर प्रशंसा कीजिए।
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