Saturday, January 9, 2021

धुतुआ /खुरुवां रोटी / पतघेरवा

 #ठेठ_पलामू:- धुतुआ /खुरुवां रोटी / पतघेरवा

बात थोड़ा पुराना बा। ई वृतांत उ समय के बा जब हम 6-7 साल के होइब। हमर गाँव में आज के तरह ना बिजली रहे, न गैस चूल्हा आउ ना ही सरकार के तरफ से अईसन कौउनो कल्याणकारी योजना रहे जेकरा से गांव के गरीब लोग के सरकार के तरफ से सहायतार्थ फ्री में या कम पईसा में कुछ राशन मिल सके। जब से जन्म लेले ही तब से आज तक हर साल #पलामू में अकाल जईसन स्थिति देखली, ना तो #पटउनी के कौउनो साधन आउ ना ही भरपूर वर्षा, साथ-साथ हमीन के छोट-छोट खेत रहे ना बढ़िया बीज न खाद मिलत रहे ओह समय, तो फसल कहाँ से बढ़िया उपजी।
कमो-बेसी अापन गाँव आउ आसपास के सब गाँव के छोट किसान के हालत अईसन रहे कि साल भर के खाये भर अनाज भी खेत में ना उपजत रहे। आर्थिक तंगी आउ कम उपज अन्न के संजोवे के एक बहुत बड़ा घटक रहल। अन्न के कउनो कण/दाना बर्बाद न होवे एकर बहुत ध्यान रखल जा हलक। साथे-साथे कुटाई-पिसाई के साधन भी ढेंकी-जांता रहे कुछ सम्पन्न लोग ही मिल में #कुटवाव-#पिसवाव हलन।
शायद अईसने परिस्थित से या फिर कह सक ही कि अापन मिट्टी संस्कृति के देन से जाड़ के दिन में एगो डिश/व्यंजन हमर घर में बनत रहे जेकरा #धुतुआ कहत रहन। धान कुटइला पर धान के भूसा के साथ कुछ कण (टूटल चावल) चल जाला, जेकरा खुद्दी/चुन्नी बोलल जाली। उ समय के गरीबी में खुद्दी/चुन्नी के भी भूसा में से सूप से फटक के अलग कइल जा हलक, ताकि ओकरा भी कउनो रूप में खाइल जा सके। इहे #खुद्दी चावल आउ उरीद दाल से बने वाला एगो डिश रहल #धुतुआ। खुद्दी चावल आउ उरीद दाल के(दो भाग चाउर एक भाग दाल) फूला के ओके सिलउठ में टांठ (कड़ा/टाइट)पीस के ओहमें नमक, मसाला (मिचाई, हरदी,जीरा, लसुन ,हींग के पीसल) मिला के आउ महुआ, कटहल या परास के पतई के दोना टिप के ओह में भर के आउ तसला/डेगची के खउलईत पानी में बन्द टिपल दोना एक-एक करके डाल के ढँक देल जा हलक आउ बस कुछ देर में बन जा हलक स्पेशल डिश #धुतुआ। नगपुरिया में एकरे #पतघेरवा या #पतभरवा भी कहल जाला।
अईसन ना रहे कि ई डिश खुद्दी से ही बनतक पर अच्छा चावल के उपयोग तो भात में हो जात रहे, तो अच्छा चावल के जगह पर खुद्दी/चुन्नी के उपयोग कइल जा हलक। डिश एकरा हम ई ला बोलइत ही कि खाये घरी एकरा साथे आउ कउनो चीज के जरूरी ना पड़त रहे, काहे कि एहमें नमक मसाला मिलल रहत रहे बस दोना से बाहर निकाल के हम सब लइकन हाथ मे एकरा लेके खेलइत-खाइत रही। हमार बचपन के ई फेवरेट डिश रहे हर तीसरे चौथे दिन #माई जरूर बना देव हलक।
हमार समझ से परिस्थितिवश या परम्परागत पैदा भईल ई डिश आज के परिप्रेक्ष्य में केतना प्रासंगिक हो गईल बा, आज उपलब्धता आउ सम्पन्नता के बावजूद हमीन के आहार केतना बदल गईल ,पहिले मजबूरी में भी जे आहार रह हल उ शुद्ध आउ पौष्टिक रह हल। आज ओकर जगह दूषित/मिलावटी आउ ब्राण्ड के नाम से महँगा डब्बा बन्द चीज ले लेले बा। बाकी रहल-सहल कसर फ़ास्ट फूड पूरा कर देव्ईत बा। समय आउ परिस्थिति परिवर्तनशील हन ओकरा रोक ना सक ही, पर आधुनिकता के दौर में भी कुछ चीज पर विचार कइल बहुत जरूरी बा। जाड़ शुरू हो गईल हन तो हमरा #माई के आउ ओकर हाथ के बनल #धुतुआ के बहुत याद आवईत हन। रउवनी सब एकरा बारे में जानिला कि नई जरूर बताईब......।
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