#ठेठ_पलामू:- धान उसनाया कि नहीं
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मने अगर चावल के बड़ाई किया जाए, तो चावल जितना पुराना और पतला हो उतना अच्छा रहता है। अभी के टाईम जैसा खरीद के चावल तो चाहे अकाल में आदमी खाता था या तो जे ग़रीब-गुरवा रहे उ खाता था। नहीं तो अच्छा-अच्छा घर में आपको 2-3 साल के पुरान अरवा चावल का भात खाने मिल जाता था।
हाँ, तो वैसे शायद ही कोई पलामू के होगा जिनको अरवा-उसना चावल के प्रकार में अंतर न पता हो। वैसे तो खेती हमलोग के यहाँ दोनों परकार के चावल के लिए उपयुक्त धान का होता है, पर #अरवा के साथ- साथ #उसना चावल का प्रयोग पलामू में थोड़ा ज्यादा होता है। शायद यही सब के चलते जब हमर चाचा के बेटा अापन मामा घर में अरवा चावल नहीं खाता है, तो सब चिढ़ाता भी है कि पलामू के न है अरवा कहाँ से बढ़िया लगेगा।
अब उसके पीछे भी कारण ये है कि नया अरवा चावल का भात अगर बनाया जाए, तो पचाने में मुश्किल हो जाता है- पेट खराब, गैस का समस्या आम हो जाता है। इसलिए भी यहाँ नया धान को उसन के ही खाते हैं और अरवा चावल को कुटवा के बाद के लिए रख देते हैं।
अभी जाड़ा के दिन है न, अभी भोरे-भोरे उठते तो देखते कि दादी आउ माई दुनो #पंचअछिया (पाँच मुँह वाला चूल्हा) जोर के उसपे धान उसीनने के लिए चढ़ा के भूंसी झोंक रही है। हमीन लईकन भी जा के भूंसी झोंकने का काम बड़ा मजा ले ले के करते रहते थे। जइसे ही भूंसी आग में झोंकते वैसे ही आग और तेजी से जलने लगता तो हमलोग उतना ही खुश हो जाते। कब उतना ठंडा में भी 2-3 घण्टा आग तापते, भूंसी झोंकने में निकल जाता पता भी नहीं चलता।
जब धूप निकल जाता, तब तक काम करने वाली भी आ जाती तब हमलोग भी हटते थे। पर दादी लोग का काम अभी ख़त्म कहाँ होता था, धान उसनने के बाद ढाबा, दुरा पर उसको पसार के सुखाना, अच्छे से सूखे इसलिए बार-बार चलाते रहना। बाद में जब #ढलईया हो गया तो हमलोग का काम और बढ़ जाता था। बांस के #निसईनी से बोरा में भर-भर के छत पर चढ़ाना , अगर जादे बड़ा बोरा रहे तो फिर रस्सी से बाँध के छत में चढ़ाना। सब धान एक जैसा सुखना चाहिए, अच्छा से सुखना चाहिए नहीं तो चावल टूट भी जाता था । इतना सब के बाद नया चावल तैयार होता था।
और अभी उस टाईम के आदमी के खाली याद दिला दीजिए, तो उनके लिए #बाकर के उसना #चाउर के माड़ आउ भात के स्वाद के सामने #हैदराबाद के #बिरयानी फेल है। कहेगा नया चावल में #बिहन करने से लेकर भात बनाने तक का जो पूरा परिवार का मेहनत होता था, उसके चलते सिर्फ माड़-भात में भी उ मिठास और स्वाद रहता था, जो 56 भोग में भी मिलना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि अभी वह स्वाद नहीं है, बस जरूरत है फिर से गाँव में जाकर उसको टेस्ट करने की। ख़ैर हमारे घर तो धान उसनना स्टार्ट होने वाला है आपके घर हुआ कि नहीं।
@Anand Keshaw

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