#ठेठ_पलामू:- मेहंदी
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#सावन सिर्फ हरियाली ही नहीं बल्कि तीज-त्यौहार का महीना है।तीज-त्यौहार का समय हो तो मेहंदी लगाने की रस्म बहुत जरूरी है। यह बात अलग है कि कभी-कभी ऐसे खुशी के समय में जानकारी की कमी और थोड़ी असावधानी के कारण रंग में भंग भी हो जाता है।मुझे याद है कि पिछले त्यौहार के समय ही ऐसी ही एक खबर से हम सभी हैरान परेशान हो गये थे कि केमिकल युक्त मेहंदी लगाने के कारण कई लोगों को त्वचा में एलर्जी और विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ा था।
यह सब पढ़कर हमें हमारा गाँव याद आ जाता है। जहाँ अधिकांश घरों के आँगन या बाड़ी में मेहंदी का हरा-भरा पौधा जरूर होता था। जिसके घर में मेहंदी का पौधा नहीं होता था वे कहीं न कहीं से व्यवस्था कर ही लेते थे। सावन के महीने में अपने प्रिय से मेंहंदी लाने की फरमाईश वाला यह प्रसिद्ध बनारसी कजरी गीत आप सबने जरूर सुना होगा -
"पिया मेहंदी लिया द मोती झील से
जाके सायकिल से ना.......!
पिया मेहंदी लियावा, छोटकी ननदी से पिसवा
हमरे हथवा में लगा द कांटा कील से...
इ ह सावनी बहार मान बतिया हमार
कौनो फायदा ना निकली दलील से
जाके सायकिल से ना........!"
जी,हाँ! सावन के महीने का आना था कि गाँव-घर में लड़कियों की टोली, मेहंदी के पत्ते सिरूकना शुरू कर देती थी।फिर उन्हें सिलवट पर खूब महीन पिसा जाता था। मेहंदी पीसना भी कम मेहनत का काम नहीं था। पीसने वाले को अपने हाथों में प्लास्टिक बांधना पड़ता था।जिससे कि उसके हाथ कहीं पहले ही लाल न हो जाएँ। #मेहंदी की गुणवत्ता बढ़ाने या यों कहिए कि मात्रा बढ़ाने के लिए उसमें लाल ईंट का छोटा टुकड़ा और रेड़ी का पत्ता भी पिसा जाता था। मेहंदी पीसने का काम ज्यादातर घर की भाभियों को सौंप दिया जाता था। जिसे वे ख़ुशी से गुनगुनाते हुए करती थीं -
"हमरो ननद बड़ी छबिलिया हो
लवले मेहंदी के गाछ
रगड़ी-रगड़ी मेहंदी पिसली हो
उठवली रेड़िये के पात.......।"
इतने लगन और उत्साह से पिसी गई मेहंदी को माचिस की तीली या नीम के सिक से हथेली पर रचाया जाता था। घर की पढ़ी-लिखी फैशन वाली बुआ बारीक़ और सुन्दर डिजाईन बनाने के लिए सुई का प्रयोग भी करती थी। उस मेहंदी से मिलने वाली ठंडक का अहसास,बाजार में बिकने वाले मेहंदी से कभी नहीं मिल पाया।
मेहंदी को छुड़ाने के बाद जो लाल संतरी रंग निखर कर आता था तो ऐसा लगता था मानो हथेली से प्रातः के सूरज की किरणें प्रस्फुटित हो रही हों या उन हथेलियों पर एक साथ कई पलाश के फूल खिल गए हों। मेहंदी के निखरते हुए रंग के साथ शुरू हो जाती थी हँसी ठिठोली और छेड़खानियाँ। जिसकी हथेली पर जितना गहरा रंग आया है। उसे उतना ज्यादा प्यार करने वाला दूल्हा मिलेगा। गहरे रंग प्राप्त करने वाली लडकियाँ इतराती थी तो थोड़ी फीकी रंग पाने वाली लडकियाँ रंग को गहरा करने के लिए हथेली में मेहंदी का तेल, चुना, गर्म तवे पर लौंग जला कर उसके धुएँ का सेंक और पता नहीं क्या-क्या उपाय करती थीं। मामला साफ़ था, चाहे जो भी करना पड़े जीवनसाथी का प्यार कम नहीं होना चाहिए।
मेहंदी न सिर्फ सौन्दर्य प्रसाधक और शुभ शगुन की चीज है, बल्कि औषधीय गुणों से भरपूर भी है। मेहंदी का प्रयोग शरीर की उष्णता कम करने, जोड़ों के दर्द, सर दर्द, त्वचा रोग (पानी लगना) इत्यादि के उपचार में भी किया जाता है। मेहंदी बालों के लिए बेहतरीन टॉनिक है। वर्तमान समय में शहरीकरण और बाजार में उपलब्धता के कारण प्राकृतिक मेहंदी का स्थान केमिकल वाले #चाइना के मेहंदी ने ले लिया है। जो जितनी जल्दी काला रंग लाता है।उतने ही बुरे तरीके से जाता भी है और साथ में एलर्जी और त्वचा की समस्याएँ बोनस में दे जाता है।
चलिए!इस #तीज और #रक्षाबंधन के अवसर पर अपने गाँव की #बारी में,या आप महानगरों के फ्लैट में रहते हैं तो घर की बालकनी में एक मेहंदी का पौधा जरूर लगाएँ। चलिए अपने गाँव के उन दिनों को जीने की एक छोटी-सी कोशिश करते हैं, जहाँ मेंहदी लगाना सिर्फ एक रस्म नहीं बल्कि स्नेह और आत्मीयता के साथ वास्तविक खुशी महसूस करने का अवसर हैं।
©Jaya Dubey
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