Saturday, January 9, 2021

सोमवारी पूजा

 #ठेठ_पलामू: सोमवारी पूजा

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पलामू के गर्मी तो दादा हो वर्ल्ड फेमस बा. अइसन सूखा ज़मीन, खेत खलिहान और उ तो छोड़ू, आबदीन तक सुख जाले. झोल्टा के करिया हो जात रही हमीन सब.
इहे से हमीन सब सावन के इंतजार बेसब्री से करती. और सूर्य देव के प्रकोप के बाद इंद्र देव के नजर जब हमनी फूल जइसन रेंगन पर पड़तक तो मोहा के भेज देतन बड़का झटास. हमर गुमाइल दूधिया रंग वापिस आ जैतक.
वो पहिला झटास और हम न भींजूं, ई तो होइए न सकत रहे. खुद के हीरोइन समझ के खूब देर तक पानी में फूलती. बॉलीवुड के असर हमीन जइसन छोटका शहर के लइकिन पर कुछ खास पडत रहे. खुद के दिव्या भारती और माधुरी से कम न आंकती जी. पर हम सर्दियाह तो लइके से रही, अगला सात दिन नाक पूछत बिततक और माई के गारी सुनती से अलग से!
लेकिन सावन में एगो आऊ खास चीज के याद आवे ला. सावन के सोमवारी! एकर बड़ा महातम बा. हमीन रेंगे से सुनत आवत रही कि बढ़िया बर और घर चाही तो चार सोमवारी के उपवास करेला जरुरी बा. और अगर 'अक्षय कुमार' जइसन दूल्हा चाही तो सोलह करे के पड़ी.
सोमवार के दिन भोरे-भोरे उठ के पहले चउतरा साफ़ करती. फिर डोलची ले के निकल जयति फूल और बेलपत्र के खोज में. सोच अइसन रहे कि जितना फूल बेलपत्र महादेव पर चढ़ाइब उतने फल मिली. कम्पटीशन तो टाइट रहे. टोला के एक से एक लडाकिन लइकिन भी लाइन में रहतन. बड़ी जद्दोजहद के बाद हम इतना फूल और बेलपत्र जुटा लेती जितना में आजी, माई और चाची आराम से पूजा करे पार जइतन.
नहान धोवान के बाद बैठती बेलपत्र लिखे. भाई! कम से कम 5 रुद्री बेलपत्र तो महादेव पर चढ़ाइब न जी. और सब पर चन्दन खल के, रोड़ी चन्दन मिला के 'श्री राम' लिखना अनिवार्य रहे. उतना में पानी बरस गइल, तो भींज भले जइती लेकिन हटती नहींए उहाँ से. आखरी पार्वती माई भी तो अइसन भारी तपस्या कइले हलन तब न महादेव मिललथी उनका.
सब औरत के महादेव जइसन बर चाही. उनकर खासियत इ बा कि उ अपन मेहरारू के सब बतवा मान जा लथी. पर मन में एगो डरो रहे - कि नेचर तो बढ़िया हैं महादेव के लेकिन निसा-पानी पर भी कुछ जादे ही ध्यान रह लइन उनकर?
बड़ी प्रेम से पूजा करती. खूब दूध-दही-घीव और गंगाजल से भगवन के स्नान करा के, खूब सूंदर रोड़ी और चन्दन के टिका लगइती. फिर धतूरा, अकवन और जहरकनैल से महादेव के सिंगार करती.
'ॐ नमः शिवाय' के जाप कर कर के, एक-एक बेलपत्र महादेव पर चढ़ा देती.
उ दिन हमर घर के करीब सब्बे बेकत के उपवास रहतक. धूप अगरबत्ती के महक से पूरा वातावरण शुद्ध हो जात रहे. बीरन साव के दूकान के पेड़ा और लंगड़ा आम, उ दिन के इहे आहार रहतक.
टोला में एगो हमर दोस्त रहे, उहो व्रत रखत रहे. बड़ी गरीबी में जीवन यापन करत रहे. पर एतना निश्छल उ लईकी रहे कि बिना कुछ खाए खाली पानीए पर पूरा दिन गुजर देताक पर चूं न कर तक बेटी! हम अपन घर से छुपा के ओकरा ला भी पेड़ा और आम ले जइति. अभी अनायास उकर याद आ गइल. महादेव ओकर सुन लेलथीन, बढ़िया घर बियाहल चल गेलइ.
सावन के सोमवारी में एक सोमवार मंदिर जाना जरुरी बा न. हमीन पैदले निकल जइती. ठाकुरबाड़ी, देवी मंडप, काली मंदिर और शिवाला. खूब मन लगा के पूजा करती. चुड़िहारिन आ के माई पीतियाइन के हरियर चूड़ी पहना जइतक. बगल वाली चाची के खेत से मेहँदी के पत्ता अईतक. ओकरा सिलउट पर पीस के घोल तैयार करल जइतक और बढ़नी के सींक से खूब प्यारा मेहँदी हम सब आपन हाथ पे रचइती.
हाँ उ जमाना में हरहरवा सांप भी खूब निकलत रहे. आजकल तो हम डेरा जाइला एगो कॉकरोच से भी, लेकिन उ वक़्त तो बगल से सांप निकल जइतक तबो कोई फरक ना पड़तक.
अब बड़का शहर में इ सब मजा ना मिले पारे. इहां तो पचास रुपैया के बेलपत्र भी फाटल मिल ला. याद आवेला उ बेल के पेड़, जेकरा पर चढ़ के भर डोलची बेलपत्र हम तोड़त रही. ओकरा बारे में फेमस रहे कि रात के एकरा पर चुड़ैल आवली.
आजकल हाथ में केमिकल वाली मेहँदी लगा के भी उ रंग ना उभरे पारे. और केतनो महंगा दाम दे कर भी उ हरा चूड़ी के मजा ना मिले जे उ चुड़िहारिन पांच रुपये में पहिनावत रहन. इ सब सोच के तो विचलित मन पहुंच जाला उहे बेबाक, बेलगाम बचपन में आउ उ हमार रेड़मा के गलियों में ..
ओ रे सावन जरा थम के बरस
बीते यादों की है मन में कसक,
आज पी से मिलने की चाह नहीं
नैहर जाने की है मन में ललक.
वो आम के पेड़ पर सजा सादा रस्सी का झूला
वो दोस्त यार जिन्हें मन कभी न भूला,
वो मेहँदी और मिट्टी की सौंधी महक
वो चारो और चिड़ियों की चू चू चहक.
वो लहलहाते खेत और भरा खलिहान
जो कभी हुवा करते थे हमारी शान,
वो उन्मुक्त सी पगली मैं तितलियों के पीछे भागती
आज चाह कर भी नहीं ला सकती वो सादगी.
वो मंदिर की घंटी वो शिवाला की शांति,
वो नटखट से भाई वो माँ के चेहरे की कांति,
वो पिता का प्यार और पितियाओं का दुलार
कम थे साधन पर था सुख अपार.
इतने दूर बैठे जिसके नाम पर आज भी आहें हूँ भरती
धन्य है तू! ओ पलामू की धरती..
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