Saturday, January 2, 2021

माटी के घर

 #माटी_के_घर

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नाम सुनते लगता है न जैसे कि- "जा सार के अभी तक फलना के घर माटिये के हई। का करबाहुं गरीब हई, कहाँ से बनतई।" मने कहा जाए तो एक तरह से माटी के घर आऊ पाका के घर एक जरिया हो गया है अमीर आऊ ग़रीब में फ़र्क करने का। तो चलिए हमलोग भी आज अमीर आऊ ग़रीब में तो नहीं लेकिन माटी आऊ पाका के घर में फ़र्क समझते हैं।
उस समय भी ई पहचान माटी के घर देख के ही किया जाता था कि केकर घर केतना #भीत ( दिवाल/ दीवार) के है। जैसे सबसे नॉर्मल आदमी के घर कहिए तो दु भित्ति (मने एक लाइन से दु दीवार ,इसमें साईड वाला को नहीं गिना जाता था। अइसही तीन भित्ति, ( घर और ढाबा) , चार भित्ति ( घर ,ढाबा, खिरकी ) , पाँच भित्ति ( घर, ढाबा, खिरकी और दूरा) या किसी-किसी के घर में बीच में एक बड़ा घर और उसके चारों तरफ से भी घर बना हुआ रहता था। #दूरा होना उस समय में बहुत बड़का और सम्पन्न होने का पहचान था। बाबा बताते हैं कि उस टाईम में दूरा देखते आदमी के धन सम्पति और खेत बारी के अंदाजा लगता था।
आज अगर हमलोग या हमलोग के पहले के पीढ़ी के सामने कोई अगर #पटवट, दूरा, खिरकी, अंगना, अंगनाई, ओरियानी, निसइनि, दिरखा, कोठी, सिटकिनी, ढाबा, पीढ़ा, ई सब नाम कह दे न तो पता न कहीं से लगता है जैसे कुछ अपना-अपना सा फिलिंग आ जाता है और हो भी काहे नहीं आखिर कितना आराम लगता था माटी के घर में। जब गर्मी के दिन में पूरा लहर से हालत खराब रहता तब पटवत वाला घर में पूरा परिवार एक साथ ऐसे पैक रहता था जैसे अभी के टाईम में फ्रिज में सब्जी। भले बहरे सब तपते रहे, पर घर के भितरे अईसन आराम कि का कहना। आज भी अगर लाईन न रहे, तो हमर घरके पटवत वाला घर ही सबसे बेस्ट जगह होता है दिन काटने के लिए। सुबह में अंगनाई में खेले में लईकन के कोई दिक्कत न कित्त कित्त हुरा कबड्डी सब अंगनाई में हो जाता था। लईकन माई-बाप के नजर के सामने ही रहते और आसपास के सब के साथ मिल के खेलते भी।
पटवत पर से सामान निकालना और निसाइनि पर चढ़-चढ़ के झूल झूल के नीचे कूदने में उ मजा कि पूछिये मत। जब कभी पटवत पर कोठी में चाउर रखना रहता तो सबसे पहिले लईकन सब रेडी रहता कि हम चढ़ाए तो हम चढ़ाए। गर्मी के दिन में अंगना में एक लाईन से खटिया लगता, तो फिर ढेर रात तक अइसही बतकही में टाईम निकल जाता। बरसात होइते बर्तन लेके जहाँ-जहाँ पानी चुवइत रहता वहाँ छानना, ओरियानी के कोना में जहाँ धार तेज गिरता उसमें नहाने में अलगे मज़ा रहता था। खासकर अभी के टाईम में ढाबा में सुतल रहिये बाहर पानी रात भर बरस रहा है, बिजली कड़क रहा है और सब आपस में हाहा-हीही कर रहे हैं। लिपाइल ढाबा पर गलती से तुरंत चल गईला ओर देवर भउजाई में जे लड़ाई के मजा मिलता कि पूछिये मत। तो अब जे ई सब जिंदगी जी लिया है, उसके सामने उ सब शब्द सुन के अपनापन ना मिले ई कभी हो सकता है।
सरकार आज सबको पक्का मकान बनाने पर जोर दे रही है। जरूरी भी है, गाँव का शहरीकरण तेज़ी से हो रहा है। आज गाँव में जाइए, तो हर कोई का पक्का मकान नजर आ रहा है। जिधर देखिए रंग-बिरंगा घर-ही-घर दिखेगा। पर उ भी एक समय था, जब सब के घर एके रंग में रँगल दिखता था। समय के साथ पक्का मकान भी जरूरी है, पर अगर आपके पास जमीन है और अगर सक्षम हैं तो कोशिश करिये पक्का का मकान तो बनाये पर माटी के घर को भी रहने दे। ताकि कम-से-कम जो अपनापन हमलोग को उ शब्द से मिलता है उ अपनापन से अगला पीढ़ी वंचित न रह जाए और आगे चल के किताब में पढ़े कि- "पहले के जमाने में माटी का घर हुआ करता था, जिसमे दूरा अंगना, कोठी, ढाबा इत्यादि हुआ करते थे।
अब अगर किसी के पास अभी भी माटी के घर होगा, तो उसका फ़ोटो जरूर भेजिएगा। किसी को अपने बचपन के घर से जुड़ा कोई किस्सा याद होगा तो जरूर बताइएगा।
© Anand keshaw
Photo: Ashish pandey, Panki.
Ashish pandey is scientific imaging professional and technical officer at regional Institute of biotechnology Hyderabad.
Image may contain: outdoor and nature, text that says "ठेठ पलामू माटी के घर"
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