जब इंसान ने आग जलाना सीखा होगा, आग में खाना पकाना सीखा होगा, तब सबसे पहले उसे चूल्हे की जरूरत महसूस हुई होगी। देखा जाए तो, इंसानी सभ्यता के विकास क्रम में चूल्हे का महत्व काफी ज्यादा है। शुरू में तो कुछ पत्थर को रख सीधे आग में पकाया जाता रहा होगा। मगर विकसित होते ही बर्तन के आविष्कार के साथ-साथ चूल्हे का भी सतत विकास हुआ।
अब तो गाँवों में भी गैस सिलेंडर पहुँच चुका है, लेकिन मिट्टी के चूल्हे में बने खाने का स्वाद ही कुछ अलग ही होता है और जो लोग नॉनवेज के दीवाने हैं, उनसे पूछिए इसके स्वाद की कीमत। यकीन मानिए उसमें अऊंटाया(उबला) हुआ दूध का स्वाद अमृत से कम नहीं होता है। कसम से आत्मा तृप्त हो जाती है। लकड़ी के चूल्हे पर भुना हुआ मसाला किसी भी सब्जी का स्वाद चार गुना कर देता है।
मिट्टी के चूल्हे बनाने के अपने नियम होते हैं, जब चैत्र का महीना आता है तब सभी के खलिहान, बारी, आँगन में मिट्टी के चूल्हे बनने लगते हैं, गाँव में इसे चूल्हा पारना कहते हैं। किसी और महीने में चूल्हा नहीं पारा जाता है, इसलिए एक कहावत भी फेमस है 'माघ के चूल्हा बाघ होला' माघ में ज्यादा गर्मी होता है न, तो चूल्हा तेजी से सुख जाता है, जिसकी वजह से फट जाता है और साल भर नहीं चल पाता। चूल्हा पारने वक़्त महिलाएँ विशेष गीत गाती हैं, चूल्हा बेहद ही पवित्र माना जाता है, छठ और शादी में आज भी इसे ही इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए नहा-धो कर ही इसे बनाने की शुरुवात होती है। वैसी महिला जो चूल्हा बनाने में एक्सपर्ट हो, इस वक़्त रिश्तेदारी और अगल-बगल में पूछ बढ़ जाती थी। केवाल मिट्टी में धान के भूसी को मिला कर बनाया जाता है।
आज जैसे चूल्हे के बर्नर की संख्या ज्यादा होती है, वैसे ही इस मिट्टी के चूल्हे के भी अलग-अलग प्रकार होते हैं, जैसे एक मुँह वाला, एकछिया, दुमुहिया, तिनमुहा इस तरह से नाम होते थे, हो सकता है हर गाँव संस्कृति में अलग-अलग नाम हों, परन्तु चूल्हे पर पका हुआ भोजन खाने का अलग ही मजा है।
मिट्टी के चूल्हे को जलाना भी एक कला है, जिसे अनुभवी लोगों से सीखना पड़ता है, कि कैसे कम धुआं में, कम जलावन में ज्यादा खाना बना लें। नई-नवेली को तो कई बार आँसू बहा-बहा के परेशान हो जाती हैं। पर किया भी क्या जा सकता है, कुछ पकवान तो सिर्फ माटी के चूल्हा में ही बनते हैं। अब लिट्टी सेंकना हो तो, गैस का चूल्हा पर थोड़ी न बनेगा।
©Sunny Shukla

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