#ठेठ_पलामू : ऊन और कांटा
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"आज की बात नहीं है. बचपन से ही यह बुनाई की कला देखता रहा हूँ. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता जब मेरे सामने - सामने नजर आता कि कैसे मात्र दो कांटों और ऊन के बंडल की मदद से पूरा स्वेटर तैयार होता जा रहा है.
लेकिन आज के"#रेडीमेड के दौर में यह विद्या लुप्त होने के कगार पर है. ना तो रेडमेड में इतनी गर्माहट है न ही अपनापन. यह मामूली कला नहीं है. हम सिर्फ इसको गर्मी और प्यार का नाम दे देते हैं, लेकिन यह कला वास्तव में एक कठिन कला है और यह लुप्त नहीं होनी चाहिए. बुनाई की कला, तैराकी की तरह सबको आनी चाहिए, क्योंकि यह हमको आत्मनिर्भर बनाती है.
अब न तो फेरी वाले ऊन लिए दिखाई देते हैं न ही हाथों में कांटा लिए औरतें/लड़कियाँ.
देखा जाए तो इससे महिलाओं के बीच अपनापन भी बना रहता था क्यूंकि नया डिजाइन सीखने के लिए वो एक दूसरे के सम्पर्क में तो रहती थी, साथ ही सुख-दुख बांट लिया करती थी. वैसे देखा जाए तो you tube के आगमन से डिज़ाइन सीखना आसान हो गया है, जैसे कि कोरोना में लोगों ने पाक कला सिखा. खैर जो भी बुना हुआ स्वेटर पहने होंगे वो ही इसका महत्व समझ सकते हैं. तो अपने अनुभव साझा करें और बताएं कि अंतिम बुना हुआ स्वेटर आपने कब पहना? और अगर अब भी आपको कोई बुन कर दे रहा है तो वाकई आप बहुत किस्मत वाले हैं.
बाकि प्यार में पिया को मफलर भेंट करने का रिवाज़ अब भी है कि नहीं इसपर भी झांकने की जरूरत है.
©अमित पाण्डेय

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