मारबो रे सुगवा धनुख से,
सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से,
आदित होई ना सहाय............. की ध्वनि सुनते ही याद आता है कि अरे! छठ आने वाला है।
ये संगीत भी क्या कमाल की चीज है न.... सुनते ही उसकी धुन में खो जाता है मन। यूँ तो संगीत हर जगह है, चाहे वो हवाओं की सनसनाहट हो, पत्तियों की सरसराहट हो, पक्षियों की चहचहाहट हो या फिर नदियों की कलकल करती ध्वनियाँ हों। ये सब ध्वनियाँ तो प्रकृति की देन हैं, परंतु कुछ धुन मनुष्यों ने भी तैयार किया है, जो बरबस ही हमारा ध्यान हमारी संस्कृति की ओर आकृष्ट कराते हैं, जिन्हें हम लोकगीत कहते हैं।
लोकगीतों ने सदियों से हमारी परंपराओं और संस्कृति को सहेजने का कार्य किया है। इतिहास की गाथाओं, समाज की मान्यताओं और रस्मों को जीवित रखने का कार्य लोकगीतों ने भलीभाँति किया है। लोकगीतों में जीवन का हर पहलू समाहित होता है। सोहर, विवाह, कजली, रोपनी, लोरी या फिर पर्व-त्योहार के गीत सभी इसमें समाहित हैं।
अभी तो छठ पर्व के आगमन का समय हो चला है और उसके गीतों में जो मिठास और संवेदना होती है, वह आनंद विभोर करने वाली होती है। छठ के गीतों को सुनना और उसे समझना कला है, जो मनुष्य जीवन का आधार है।
#ठेठ_पलामू लोकगीतों को सहेजने के लिए एक शृंखला की शुरुआत करने जा रहा है। इसके अंतर्गत हम लोकगीतों को उसमें व्यक्त हुए भावों के सहित लिखकर प्रकाशित करेंगे।
चूँकि अभी छठ पर्व नजदीक था, इसलिए पेज के सभी लेखकों और पाठकगण से निवेदन है कि आप छठ के गीतों को उसके भाव सहित लिखकर भेजें, उसे पेज पर प्रकाशित किया जाएगा।

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