#ठेठ_पलामू: दशहरा के मेला
वइसे तो दशहरा में 9 दिन तक रंगारंग कार्यक्रम चलते रहता है पर उसमे भी लास्ट के दु दिन अष्ठमी/नवमी के अलगे रंग रहता है। एक तो गाँव घर के असली भीड़ जो अभिए दिखता है। धान कटाई के टाईम रहता है इसलिए भी बाहर काम करने वाले लोग भी इस समय गांव में ही रहते हैं। पर इ सब से अलग हम बस आज एक सीन का ईयाद दिलाना चाहते हैं।
कुछ दूरी पर सास इतराते हुए अपना गाँव-घर के लेडीज लोग के दिखाते हुए कहती हैं कि- "इहे पहुना हथी,बड़की मइयां के।ना आवैत हलथिन कि छूट्टी ना बा। तब बड़ी ज़िद करके बोलाइले ही।" तब तक बगल वाली चाची कहने में बाज नहीं आएंगी कि "मईवां से तनी उमरिया में बढ़ हथिन का" मने देखे-लेखे में #सुघर हथु। बस तनी लगलव तो कहईत हिव। देखुहुँ तो हमर #शुशमी के पहुना के.... कुछ दूर पर खड़े दूसरका दमाद के दिखाते हुए कहेंगी। अभियो बियाह के 3 साल हो गेलई लेकिन लगैत हई जैसे इहे साल बियाह होईल हई।"
उनसे कुछ दूरी पर सालियों का समूह हाथ मे #बैलून लिए हुए अपन-अपन जीजाजी के पूरा बड़ाई करेंगी। "जानती हैं जी, हम न अपन जीजाजी से कहे कि जब तक स्टूडियो में फ़ोटो नहीं खिचाइयेगा तब तक नहीं जाएंगे। जा के रेडी हुए तब आएं।हम नहीं तो माई केतना कह रही थी हइये न हाई बियाह के फोटो का करबे इतना फ़ोटो। लेकिन अब बताइये न जी अब ई दसहरा बार-बार थोड़े आएगा। फ़ोटो से ही न ईयाद रहेगा। आपलोग भी रुकिएगा न #जीजाजी के साथे हमीन सब सहेली लोग भी एगो अलगे फ़ोटो खिचवाएंगे।"
थोड़ा दूर पर साला लोग अलगे हाथ मे सवा किलो #लकठो और #बेदाम लिए हुए। अब जीजाजी से लिया तो लिए थे पर साली लोग पर हाथ मे बड़का #पर्स था तो कहाँ रखती। इसलिए भाई के रखने को मिल गया था। उ भी दोस्त लोग के साथ अपना अगला दिन के पार्टी के प्रोग्राम में बिजी। कि- "जानते हो हम अपन जीजाजी से बतिया लिए हैं कल के प्रोग्राम का। पहिले तो नहीं-नहीं कह रहे थे फिर बाद में बोले कि #चिकन बनवायेगा न तो #बियर पियेंगे लेकिन उहो जादे नहीं काहे कि दीदी के पता चल जाएगा तो फिर बहुत लड़ेगी। पिछला बार #चुनौटी मिला था से दु दिन तक बात नहीं की थी। फिर बड़ी मुश्किल से समझाए थे - "तो कही थी कि खैनी तक ठीक है लेकिन अगर ड्रिंक किये न तो फिर समझ लीजिएगा। हम चल जाएंगे अपना माई घर , हं....।
अब एक अलगे ग्रूप रहेगा जिसमे बियाहल लईकी पर लाईन मारने वाला कुछ लड़का लोग,सालियो के #बॉयफ्रेंड लोग सब साथे। गरियाते हुए, देख देख के पछताते हुए। देख न हमरा न ठुकराई थी इसीलिए अईसन लड़का मिला है। हमको कही थी कि अस्मार्ट नहीं है।उसका पहुनवा केतना #अस्मार्ट है जे। मेरा #हाय लगा है और मेरा हाय कभी बेकार नहीं जाता है।
ई सब अलग-अलग दृश्य था। जिसको साईड से हम देख रहे थे बाकि बताशा के परसादी चढ़ रहा था दुर्गा जी के मूर्ति पर । एकतरफ #परवचन, तो कहीं रामलीला पर्दा पर चल रहा था। हमीन तो ड्रामा देखने वाले थे।आज 'लैला मजनू' का ड्रामा होना है उहे देख के घर जाना था।
ये दृश्य भले 10 साल पुराना हो पर आज भी बहुत ज्यादा बदला नहीं है। गाँव हो या शहर हो, भाषा और स्थान बदल गया हो। स्टूडियो के जगह सेल्फी ले लिया हो। पर दसहरा में पहुना के #भौकाल में कोई कमी नहीं हुआ है। बाकि ससुरारी से जाने के बाद दोस्त लोग से लिया कर्ज़ा उस टाईम भी भरा जाता था आज भी भरा जाता है। और अगला दसहरा में #ससुरारी नहीं आने का स्वयं से वादा भी एडवांस में हो जाता है। बाकि कल के मेला के वर्णन कल करेंगे।
इसबार शायद ओतना भीड़ नहीं हो। अगला साल तक सब सही रहे। इसी उम्मीद के साथ आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक बधाई।
©आनंद केशव 'देहाती

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