#ठेठ_पलामू : चूड़ीहारिन
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#चूड़ीहारिन जब भी यह नाम सुनती हूँ ज़ेहन में एक ही चेहरा याद आता है। अधेड़ उम्र की वह औरत गोरी, लम्बी, छरहरा बदन, चेहरे पर हमेशा एक मोहक मुस्कान। उम्र ढल जाने और दिन भर मेहनत करने के बावजूद उस चेहरे पर कोई थकान नहीं नजर आती थी। नाम तो नहीं याद उनका क्योंकि मम्मी और चाची उनको 'चाची' कहकर ही सम्बोधित करती थी। कहने को तो बस वह चूड़ी पहनाने आती थी, पर घर वालों को उनसे एक आत्मीय लगाव हो गया था। मेरी दादी को वह 'दीदी' कहकर बुलाती थी तथा मम्मी और चाची को 'कन्या'। वैसे हमारे यहाँ सभी बहुओं को ऐसे ही नामों से पुकारा जाता है , जैसे फलनवा बहु, फलनवा के #कनया।
ये बात बहुत पहले की है, तब मैं बहुत छोटी थी, इस कारण कुछ ज्यादा याद नहीं। बस इतना ही याद आता है कि लगभग हर महीने वह घर पर आ जाती थी, सिर पर रंग-बिरंगी चूड़ियों से भरी टोकरी लिए हुए। त्योहार के समय तो उनके पास और भी कई तरह की चूड़ियाँ होती थी। उनके पास लगभग हर तरह की चूड़ियाँ होती थी - प्लेन, डिजाइन वाली, मोटी चूड़ियाँ, पतली चूड़ियाँ। अपनी चूड़ियों की विशेषता वह कुछ यूँ बताती थी- "बड़ी मजबूत चूड़ी बा कन्या, दोकान में अइसन चूड़ी ना मिली। हम तो बीस रूपया में देवत ही दोकान में तीसो रूपया के लेब न तो तुरंत टूट जाई, एकरे ले लीहूँ, राउर हाथ में बड़ी सुंदर लागी ई चूड़ी।"
चूड़ी पहनने के लिए आवाज लगाने का उनका तरीका भी निराला था। उनकी आवाज सुनकर हम हम बच्चे दौड़कर बाहर निकल जाते थे। बहुत ही मधुर आवाज में बोलती थी- "चूड़ी पहन लीहूँ ए कन्या...।"
घर पर आने के बाद वह चूड़ी पहना कर ही जाती थी। अगर कभी किसी ने गलती से यह कह दिया कि 'नहीं चाची आज रहे दीहूँ, अभीये तो चूड़ी पहिनले ही, बाद में आएब कहिनो', तो एक मायूसी सी छा जाती थी उनके चेहरे पर। पर दूसरे ही पल में वह हँसकर कहती-"ना कन्या चूड़ी के ना नहीं कहे के चाही, सोहाग-भाग के चीज बा, पहिन लीहूँ, बड़ी सुंदर चूड़ी लइले ही अबकी बार, फिर नाहीं मिली अइसन चूड़ी, फिर तो महीना दिन बादे न आइब।" खैर उनकी बातों से थक-हारकर मम्मी लोगों को चूड़ी पहनना ही पड़ता था।
एक बात उस समय की मुझे अब भी बहुत अच्छी तरह याद है। उस दिन मम्मी लोग कहीं गई थी, घर में हम सब बच्चे ही थे कि तभी अचानक उनकी आवाज सुनाई पड़ी 'चूड़ी पहिन लीहूँ ए कन्या'। मैं भी दौड़कर दरवाजे की तरफ गई और बोली "मम्मी लोग आज घर पर नहीं हैं, बाद में आइएगा।" उन्होंने तुरंत बोला कि "मम्मी नइखन तो का होलक? रउरे चूड़ी पहन लीहूँ आज!" मैंने बोला मैं तो नहीं पहनती चूड़ी। उन्होंने फिर कहा कि "हम रउरो नाप के चूड़ी रखले ही, छोट-छोट खूब सुंदर।" उस दिन मम्मी के आने पर मैं उनको ये बात बताकर खूब हँसी थी कि चूड़ी वाली दादी मुझे चूड़ी पहनने बोल रही थी। अभी यह लिखते समय भी मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
उस समय जब कभी उनको आने में देर हो जाती थी तो मम्मी लोग आपस में ही बात करती थी कि "काहे तो अबकी चाची नइ अलथी चूड़ी पहिनावे? बहुत दिन हो गेलइन?" अब तो पता नहीं वो कहाँ हैं, शायद कहीं और चली गई हों।
ख़ासकर ई सावन में, तीज में, जीतिया में, करमा में, तो उनका बहुत डिमांड रहता था। और हो भी क्यों नही इन सब त्योहार में चूड़ियों का महत्व ही इतना था। अब तो दुकान में तरह-तरह की चूड़ियाँ आने लगी हैं, पर अब भी मम्मी लोगों से यह सुनने मिल जाता है कि दुकान का चूड़ी वैसा मजबूत नहीं रहता है।
© Divya Rani

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