लोकगीत में श्रमगीत की विशेष महत्ता है। यह लोकसाहित्य के आदिम रुपों में सबसे महत्वपूर्ण है।
शायद यही कारण है कि इन श्रमगीतों के आधार पर ही लोकसाहित्य के विविध रुप विकसित होते हैं।
"ठेठ पलामू" में हमारी चित्र शृंखला का एक खूबसूरत आयाम है- धान रोपनी का एक शानदार वीडियो।जिसे हमें भेजा है- ग्राम #दमारो, थाना-नावा बाजार,पलामू के #दधिबल_महतो जी ने। यह उनके खेत पर धान रोपाई का सुन्दर दृश्य हैं, जिसमें महिलाएँ धान रोपनी के पारंपरिक गीत गा रही है।
सम्पूर्ण बाह्य परिवेश के साथ धरती और बीज भी मनुष्य के अंतर्जगत् में विद्यमान है। यह #झारखण्ड का पलामू क्षेत्र हैं। जहाँ के श्रम की महत्ता से पूरा देश परिचित है। प्रकृति के संगीत में इस लयबद्ध गीत को सुनकर सिर्फ असीम आनंद को महसूस किया जा सकता है।
"सावन धान रोपने के मौसम को कहते हैं" यह शीर्षक है #मिथिलेश_कुमार_राय जी के शानदार आलेख का। बहुत सुंदर लिखा है उन्होंने। इस वीडियो को देखकर हम सावन के महीने में इस धान रोपनी के उत्सव को देख-महसूस कर सकते हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद दधिबल महतो जी, आपके इस सुंदर, सुमधुर गीत के साथ शानदार वीडियो के लिए... हम सभी आपके आभारी हैं।
प्रस्तुति: अजय शुक्ला

No comments:
Post a Comment