#ठेठ_पलामू:- जय माँ नगर भगवती
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झारखंड के #लातेहार जिलांतर्गत #चंदवा प्रखंड मुख्यालय से मात्र दस किमी दूर रांची-चतरा मुख्य मार्ग पर स्थित #माँ_उग्रतारा_नगर_मंदिर जिसे लोग नगर भगवती के नाम से भी जानते है हजारों वर्ष पुराना है। शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध इस मंदिर में माँ उग्रतारा और माँ लक्ष्मी की मूर्तियां हैं। जैसा कि यहाँ के पुजारियों से बात कर के पता चला - इस मंदिर की स्थापना तब के #टोरी राज्य के आखिरी राजा #दिग्विजय_नाथ_शाही के पूर्वजों ने की थी। इन मूर्तियों को #लातेहार के #मनकेरी गाँव से लाकर यहाँ स्थापित किया गया था। दिग्विजय नाथ शाही के पूर्वजों ने ही मिश्रा परिवार के #पंचानन_मिश्रा जो कि #टूडहामु के रहने वाले थे को सन संवत 1664 में इस मंदिर का पुजारी नियुक्त किया।1804 ईस्वी में टोरी के अंतिम राजा दिग्विजय नाथ शाही की निःसंतान मृत्यु हो गयी थी।तब से मन्दिर का पूरा संचालन मिश्र परिवार टूढ़ामू की ओर से हो रहा है।
आस पास के जिलों के साथ-साथ दूसरे राज्यों से श्रद्धालु पूजा अर्चना के लिए सालों भर यहां आते रहते है। विशेष रूप से यहां रामनवमी तथा दुर्गापूजा का आयोजन धूमधाम से होता है। सबसे विशेष यहाँ का दुर्गापूजा है जो कि आम स्थानों पर 9 या 10 दिन का मनाया जाता है पर यहाँ यह 16 दिन का होता है। यहाँ कलश स्थापना जितिया के दूसरे दिन ही हो जाता है।
इस मंदिर में हर माह की पूर्णिमा को अपार भीड़ होती है। दुर्गापूजा के दिन तो हजारों श्रद्धालु यहां आते है। श्रद्धालुओं का मानना है कि जो यहां सच्चे दिल से पूजा-अर्चना करता है, उसकी मन्नतें अवश्य पूरी होती हैं। मां उग्रतारा नगर मंदिर शक्तिपीठ के रूप में पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है।
पूजा की परंपरा: यहां मंदिर के पुजारी गर्भ गृह में जाकर श्रद्धालुओं के प्रसाद का भगवती को भोग लगाकर देते हैं। श्रद्धालुओं को अंदर प्रवेश की मनाही होती है। यहां प्रसाद के रूप में मुख्य रूप से नारियल और मिसरी चढ़ाई जाती है जो कि वहीं की होती है। मतलब वहाँ चढ़ाये जाने वाला प्रसाद कहीं बाहर से नहीं लिया जाता है। विशेष प्रसाद के रूप में मोहनभोग भी चढ़ाया जाता है, जिसे मंदिर का रसोइया ही बनाता है। जैसा कि मोहनभोग के लिए आवश्यक सामग्री आप घर से लेकर आ सकते है पर आटा, गुड़ और घी तीनो सामान बराबर मात्रा में होना चाहिए। दोपहर में पुजारी भगवती को उठाकर रसोई में ले आते हैं। वहां भात-दाल और सब्जी का भोग लगता है, जिसे पुजारी स्वयं बनाते हैं।
मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा बकरे की भी बलि दी जाती है। मंदिर में दो बार विधिवत आरती की जाती है। मंदिर के पश्चिमी भाग में स्थित मादागिर पर्वत पर #मदार साहब का मजार है। बताया जाता है कि मदार साहब मां उग्रतारा के बहुत बड़े भक्त थे। तीन वर्षो में एक बार इनकी भी पूजा होती है और काड़ा की बलि दी जाती है। बाद में उसी खाल से मां उग्रतारा मंदिर के लिए नगाड़ा बनाया जाता है। इसी नगाड़े को बजाकर मंदिर में आरती की जाती है। बताया जाता है कि जब कोई भक्त मन्नत मांगता है और उसकी मन्नत पूरी हो जाती है तो मंदिर परिसर में पांच झंडे गाड़े जाते है। एक सफेद झंडा मदार साहब की मजार पर भी गाड़ा जाता है।
मां भगवती के दक्षिणी और पश्चिमी कोने पर स्थित #चुटुबाग नामक पर्वत पर मां #भ्रामरी देवी की गुफाएं हैं, जहां कई स्थानों पर बूंद-बूंद पानी टपकता रहता है। करीब सत्तर फीट नीचे सतयुगी केले का वृक्ष है, जो वर्षों पुराना होने के बावजूद आज भी हराभरा है। इसमें फल भी लगता है। वहां मौजूद एक पत्थर के छिद्र से तीव्र गति से पानी हमेशा निकलता रहता है, मगर यह पानी सिर्फ केले के वृक्षों को ही प्राप्त होता है। शेष सभी स्थान सूखे रहते हैं। इस मंदिर में हजारों वर्ष पूर्व राजा स्वर्गीय पीताम्बर नाथ शाही के वंशजों द्वारा मिटटी की चारदीवारी कराई गई थी। जिसमें सात दरवाजे हैं।
आज भी जीवंत है परंपरा:
मां उग्रतारा नगर मंदिर में राज दरबार की व्यवस्था आज भी कायम है। यहां पुजारी के रूप में मिश्रा और पाठक परिवार के अलावा बकरे की बलि देने के लिए पुरुषोत्तम पाहन, नगाड़ा बजाने के लिए नटवा घांसी, काड़ा की बलि देने के लिए प्रसाद नायक, सोरठ नायक, दूध लाने लिए चंदू नायक, भोग बनाने के लिए जयमंगल राम, टाटी लाने के लिए बुधन तुरी नियुक्त हैं।
अगर आप भी माँ भगवती के दर्शन करना चाहते, कोई मन्नत मांगना चाहते हैं तो जरूर जाइये। साथ ही साथ प्रकृति प्रेमी लोग भी जा सकते है क्योंकि तीन तरफ से पहाड़ो से घिरा मंदिर प्राँगण इस दृष्टिकोण से भी बहुत लुभावन है।
साभार:- पूजा के नियम सम्बंधित जानकारी से अवगत करवाने के लिए Mishra Ashwini ( मंदिर के पुजारी ) का बहुत बहुत धन्यवाद।
शेष जानकारी saurabhswikriti.blogspot.com के ब्लॉग से।
©Anand Keshaw

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