Saturday, January 2, 2021

तीनचकिया गाड़ी

 #ठेठ_पलामू:- #तीनचकिया_गाड़ी

बात तब के है, जब ई प्लास्टिक आऊ कचकाड़ा के समान का चलन तो था, लेकिन आज के जेतना नहीं था। इसलिए खर-खेलौना के नाम पर छोटा मोटा डमरू-उमरू भले प्लास्टिक के मिल जाये, नहीं तो बाकि बाँस वाला #फोंफी , पटपटिया ई सब मिलता था। खैर खेलौना के चर्चा अलगे से दशहरा के मेला टाईम किया जाएगा, अभी आते हैं मेन मुद्दा पर। तो मने उस टाईम जे ई प्लास्टिक के तीनचकिया साईकिल औऱ स्कूटर नहीं मिलता था।
अब आदि अनादि काल से लईकन जब गुडरने से आगे खाड़ा के डेगा डेगी पारना स्टार्ट किया नहीं किया कि साईकिल के व्यवस्था के लिए माई के डिमांड चालू हो जाता है। यहाँ ध्यान दीजिएगा जामल से लेकर बढ़न होईत तक बाल- बच्चा के जेतना जरूरत के समान से लेकर डिमांड रहता है, सब के बाबूजी से पूरा करवाने में माई का ही हाथ होता है। और बाद में उहे माई के डिमांड सुन के घर में सास पूतोह के लड़ाई भी होता है। अब उ टाईम तो स्पेशल बढ़ई लोग ही इसको बनाते थे। काहे कि ऊपर से लेकर नीचे तक ई साईकिल कहिए या टेम्पो कहिए। इंजन, बॉडी, चाका सब लकड़िये के बनल रहता था। बस चलाते समय होर्न मुँह से बजाना पड़ता था और इसी से लईका चलना-दौड़ना सीखता था।
हमको अपन पहिलका तो याद नहीं है, लेकिन दूसरा बार 4 साल के होंगे, तब घर के बगल में लाइची बाबा हैं, उन्हीं से बनवाए थे, उहो सामने बैठ के। अापन टाईम के बहुत बड़का कारीगर थे। बेतला नेशनल पार्क के जेतना पुरनका फर्नीचर अलमारी सब उहे बनाये थे। ओकर बाद रोड पर जे पों-पों कर कर के दौड़ाते थे कि कहिए मत। गलती से कौनो रोड पर बर बाजार से आते-जाते रहता, तो धक्का भी मार देते थे और उल्टा डाँट भी देते थे कि "देख के ना चलल जा हव होर्न बजावैत न हलीव।" अब जो ऐसे बोलते तो गुजरने वाला सब भी बेचारा लोग चोट लगने पर भी हँस के चल देता था। कभी शाम के खेलते समय टूट जाता कहीं से तो दूसरका दिन मरम्मत करवाने के लिए ओतना ही टेंशन रहता था, जेतना आज बुलेट रिपेयर करवाने के लिए होता है। शायद अभी से ज्यादा ही रहता था। काहे कि भोरे उठते-उठते लाइची बाबा पास पहुँच जाते थे ले के।
अब तो खैर रिमोट वाला और इलेक्ट्रॉनिक कार सब आ गया है, इसलिए इसका जरूरत भी नहीं पड़ता होगा और बनाने वाले भी कम ही होंगे। हम तो कार, ट्रेन, बोट, स्टीमर सब चलाये हैं, लेकिन ई मजा कहीं न मिला। आज के लईकन इसको तो नहीं चलाया होगा, पर बहुत सारे लोग चलाये होंगे या अपना बेटा-बेटी, पोता-पोती के लिए जरूर लाए होंगे। अगर आपका भी कुछ याद जुड़ा हो, तो जरूर बताइयेगा।
@Anandkeshaw
आनंद केशव देहाती
Image may contain: text that says "ठेठ पलामू इसके आगे लक्जरी गाड़ी भी फेल थी...एक यही है जिसके सहारे हमने चलना सीखा...इसका नाम पता है क्या किसी को...?"
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