#ठेठ_पलामू :- मूर्ति कितना बन गया ?
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बचपन में हम कितने मासूम होते हैं। नए सपने और नयी उम्मीदें हमें कहाँ से कहाँ ले जाती है। अक्टूबर का महीना बहुत खास होता है। उसी वक्त माँ दुर्गा जी के मूर्ति निर्माण की प्रक्रिया शुरु होती थी। जो नए-नए अहसास उत्पन्न कराती थी। रोज स्कूल से आते-जाते रास्ते में पड़ने वाले छोटे से मंदिर में झांकते हुए आते कि कब दुर्गा माँ की मूर्ति बननी शुरू होगी?
बेसब्री से इंतजार रहता मूर्तिकारों के आने का, पुआल और लकड़ी के ढाँचे बनाने का, मिटटी के ढेर को महीन महीन करने का और फिर हमारी कल्पना के उड़ान को पंख देने का। चर्चा का विषय होता हमारे लिए।
आज तो शेर का पैर बन गया। आज तो राक्षस का भाला। आज दुर्गा माँ की तलवार और मुकुट लगेगी तो आज औजार। कहीं राम दरबार की मूर्ति सजती तो हम तुक्का लगाते कि किस कोने में किसकी मूर्ति लगने वाली है।
उन कलाकारों से मिन्नत कर के थोड़ी सी मिट्टी हम भी मांग लाते और अपनी पसंद की आकृतियों को
बनाने की खूब कोशिश करते इस उम्मीद में कि शायद माँ के आशीर्वाद से किसी न किसी दिन हमारी कोशिशें भी जिन्दा हो जाएँगी।
अरे! आज तो पंडाल के अगल-बगल वाली घास की सफाई भी हो गया।लगता है बड़ा मेला लगेगा इस बार। फिर ढेर सारे सपने आँखों के सामने आ जाते थे। और गुल्लक वही छोटा सा.. जिसमें साल भर की मेहनत और क़ुरबानी, थोड़ी-बहुत लालच के अलावा कोई बेईमानी नहीं।
एक वो दिन थे और एक आज। जब सच के सामने सपने झूठे लगते हैं और हकीकत के आगे सभी फ़साने बेवकूफी। फिर भी हमेशा की तरह सपनों को सच करने की कोशिश में और फ़सानों को हकीकत की धरातल में रुबरु कराते रहेंगे।
खैर, दुर्गा पूजा से जुड़ी हुयी ढ़ेर सारी यादें हैं हमारे पास। आप सभी के पास भी यादों का खजाना होगा। शायद आप भी दुर्गा पूजा से सम्बन्धित अपने बचपन की बेशकीमती यादों को यहाँ अवश्य शेयर करेंगे।
©सन्नी शुक्ला

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