(पलामू के साहित्य देवता को श्रद्धांजलि-प्रथम पुष्प)
किसी रचनाकार या साहित्यकार का जन्म कोई सामान्य घटना नहीं होती। वह जब आता है, अपनी विराट् दुनिया लेकर आता है और जब जाता है तब विराट दुनिया भी उसके साथ चली जाती है। कैसी होती है वह दुनिया?
जवाब देना आसान नही है, सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है कि उसे देखने के लिए समान्य आँखों से काम नही चलेगा। उसे देखने के लिए एक खास किस्म का धूपिया चश्मा चाहिए, जो किसी हाट बाजार में नहीं मिलेगा, यह चश्मा वह रचनाकार ही दे सकता है, जिसने ख़ास किस्म की और जीवन के समानांतर चलनेवाली कोई दुनिया आबाद की है। यह बड़े लेखक, रचनाकार की महानता को आँकने का सबसे बड़ा पैमाना है। मिसाल के तौर पर निखालिस गांववाला हिंदुस्तान कैसा होता है- यह जानने के लिए किसी विदेशी पंडित को एशिया महाद्वीप के भारतीय भूखंड का इतिहास, भूगोल पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। उसे कोई शास्त्रार्थ करने की ज़रूरत नहीं है। वह सिर्फ प्रेमचंद की रचनाओं को पढ़ ले। आज़ादी के बाद का गांव वाला हिंदुस्तान कैसा होता है- यह जानकारी फणीश्वरनाथ 'रेणु' से मिल जाएगी। गांव के भीतर कब चुपके चुपके एक कस्बा आबाद हो जाता है यह सृजनात्मक ब्यौरा 'आधा गांव'(राही मासूम रज़ा) से मिल जाएगा और कब गांव और कस्बे के बीच फर्क कर पाना मुश्किल हो जाता है- यह जानकारी श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास 'राग दरबारी' दे देगा। अपने समय और उस समय की विसंगतियों की ऐसी ही समानांतर दुनिया हिंदी और संस्कृत साहित्य (खास तौर से एकांकी नाटक) में आचार्य रामदीन पांडेय ने आबाद की थी।
आचार्य पाण्डेय बड़े साहित्यकार थे, छोटे साहित्यकार थे, किन धाराओं-अंतर्धाराओं की जटिलता और और विराटता के किस पाये के साहित्यकार थे-ये बहस पहले भी चला करती थी और अब वे तेज चलेगी,जब आचार्य जी अपनी दुनिया साथ लेते गये हैं।
क्रमशः ......
Dr Satyaketu Sanjay

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