जब भी माँ नानी के घर जाती, आने-जाने की तारीख लगभग तय ही रहती थी। यूँ कहें तो मम्मी जानती थी कि अमुक दिन, तय समय पर नानी की देहरी छोड़नी ही है। फिर भी आने के समय नानी जब उन्हें पूजा घर में ले जा कर, सूप में रखी चीजों को सीधा उनके आँचल में गिराती ( खोइचा ), तो जैसे-जैसे चावल के दाने गिरते, दोनों की आँखों से आँसू भी बह निकलते थे। मुझे लगता कि क्यों रोती है माँ? क्या इन्हें हमारे साथ आना अच्छा नहीं लगता? या हमसे ज्यादा कहीं ये नाना - नानी से तो प्यार नहीं करती ? ईष्या और दुःख दोनों साथ - साथ ही मेरे मन के अन्दर घर करते, और फिर उत्पत्ति होती इस दम्भ की, कि मैं तो नहीं रोऊँगी, जब मैं ससुराल जाऊँगी। शायद यही पहला छाप था मेरे बालमन में खोइचा और ससुराल का। खोइचा अगर चन्द शब्दों में कहा जाये तो – चावल या जीरे के चन्द दाने, हल्दी की पाँच गाँठ, दूब की कुछ पत्तियाँ और पैसे या चाँदी की मछली या सिक्के। लेकिन भावनाओं में इसका आँकलन करना थोड़ा नहीं बल्कि बहुत मुश्किल है । इसमें होता था, माँ का दिया सम्बल, पिता का मान, भाई - बहनों का प्यार और परिवार का सम्मान।#खोइचा हमेशा बाँस के सूप से ही दिया जाता है, जो वँश वृद्धि का द्योतक है। हल्दी के पाँच गाँठ। वैसे तो हल्दी खुद में ही शुद्ध है, जिसे जीवन ऊर्जा देने वाले सूर्य का प्रमाण माना जाता है, परन्तु पाँच गाँठ इसलिए ताकि वो जीवन ऊर्जा हमेशा सकरात्मक हो, नकरात्मक नहीं और गाँठों की तरह ही ये पूरे परिवार को एक सार बांधे रहे। हरा दूब-परिवार को सजीवता देने के लिए।
चाँदी की मछली या सिक्के - लक्ष्मी की तरह ससुराल की बरकत बनाये रखने के लिए।
बचपन में जब माँ-चाचियाँ मायके से और बुआ ससुराल से आती तो हमारा ध्यान उनके साथ आये बायने से इतर, उनके आँचल में बन्धे खोइचे पर ही होता। जितना बड़ा उनका खोइचा, उतनी ही कुचालें भरता हमारा दिल। हमें तो इतनी जल्दी होती थी कि लगता भले मिलना-मिलाना बाद में हो ,पर पहले वो देवता घर में जा कर खोइचा खोलें, फिर अम्मा उसे निहोरने के बाद हमें सुपुर्द कर दे। आखिर उस पर हम छोटों का ही तो हक़ होता था। पहले पैसे गिने जाते फिर खोइचा में मिले चावल या जीरे को ले कर पँसेरी के तरफ दौड़ लगाते। उसे बदल कर हम ढेर सारी पसन्दीदा चीजें एक साथ लेते जो जाने कितने पॉकेट मनी बचाने के बाद सम्भव होता। जैसे की दालमोठ, ईलायचीदाना, लेमनचूस, गरी के गोले, बताशे इत्यादि।
पर जैसे-जैसे हम शहरों में आये हमारी बुआ, माँ-चाचियों का खोइचा छोटा होता गया। शहरों में पंसेरी नहीं थे। जेनरल स्टोर वाले बदली नहीं करते और उनका उपयोग किचन में नहीं हो सकता था। फिर जीन्स वाली भाभियों और दीदियों के साथ ये खोइचा भी आँचल से सरक के पर्स में आ गया। जाने कितनों ही खोइचों के हमने मलइयों और चाट पकोड़े खाये लेकिन असल मायने में खोइचा का अर्थ तो तब समझ में आया ,जब द्विरागमन में मुझे खोइचा मिला। माँ मेरे आँचल में खोइचा भर रही थी,और दानों के साथ मेरे अन्दर का न रोने वाला दम्भ भी आँखों के रास्ते आँसू बन कर पिघल रहे थे। खोइचा में से जब पाँच चुटकी वापस सूप में रखा तो लगा, विवाहोपरान्त भी मायके से अलग नहीं हुई हूँ। कुछ अँश अभी भी है मेरा और मन कह रहा था कि ये फुलवारी ऐसे ही बनी रहे भले मैं किसी और की क्यारी की शोभा बनूँ। विदाई के बाद रास्ते में जब भी डर लगता,नये घर, नये लोग, नया परिवार, आँचल में बंधा #खोइचा, वैसा ही सान्त्वना देता जैसे कि माँ ।
खोइचा हमारे पूर्वांचल में पहले सिर्फ़ मायके से ससुराल जाने के वक़्त, माँ या भाभी से मिलता था। इसके पीछे मान्यता ये थी कि माँ अपनी पुत्री को धन्य-धान्य से भर कर, माँ लक्ष्मी और अन्नपूर्णा के रूप में ससुराल भेजती थी। लेकिन फैशन के दौड़ में खोइचा भी अछूता नहीं रहा। इसे भी लोगों ने दिखावे के लिए इस्तेमाल कर लिया। अब तो ससुराल में खोइचा दुल्हन के मायके का स्टेटस बयाँ करता है। भले दुल्हन का गुण रूप कोई न देखे, लेकिन खोइचा सबसे पहले देखा जाता है। जिस मायका ने उसे लक्ष्मी-अन्नपूर्णा बना कर भेजा, उसे ही तौलना शुरू हो जाता है। फिर ससुराल से मायके जाते वक़्त उसे बढ़ चढ़ कर दी जाती है और एक अबोले प्रतियोगिता की शुरूआत हो जाती है। कहीं-कहीं तो ये रिवाज़ ही अब अन्तिम साँसें ले रहा है। क्योंकि हमारे ब्राण्डेड पर्स ( मेकअप, मोबाइल और वॉलेट से भरे ) में भी इसके लिए कोई जगह नहीं बची है और ये रिवाज भी अब ओल्ड फैशन हो गया है। पर आपको बता दें कि हमारे यहाँ तो #देवियों को भी बेेटी का ही रूप माना जाता है। पूजा के बाद विसर्जन से पहले सभी सुहागिनें उन्हें खोइचा देकर विदा करती हैं।
अब तो बस इतनी सी आशा है कि हमारा #खोइचा, उतना ही पावन और सुसँस्कृत रहे। दोनों ही घर( ससुराल एवं मायका) , वैसे ही महकते और लहलहाते रहे। भले ही ओल्ड फैशन हो चुका हो, पर खोइचे की परिपाटी बनी रहे..
साभार:- Hemant singh

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