दादी का वो झुँझलाता हुआ कर्कश स्वर " न जानी ई बेर रोपा-डोभा कैसे होई..?
एको रोपनी मिलईत ना हत, एक तो केतना मुश्किल से खेत मे पानी पकड़ाईल बा?
आऊ आजू अगर ना रोपाईल तो सब कदई चटपटा जाई।
ऊ तो इनर भगवान के किरपा बा नई तो सूरुज बाबा अपन आँख खोल देलन तो सब चऊपट हो जाई। केकरा कहूँ? कोई सुने वाला बा हमर? हमर घर के तो सब लाट साहेब होईल हत। केकरो फिकीर बा तनिको की कईसे धान रोपाई? सब के खाली खाये के आऊ घूमे के चाही।
तभी दादा जी दरवाजे से ही जोर से आवाज लगाते हैं, अहो सुनईत ह। दादी अंदर से ऊँचे आवाज में बोलते हुये निकलती है कि "का कहईत ही? ईहे न कि रोपनी ना मिललथु"। दादी की बात सुन दादा जी एक पल के लिये अवाक, चुप, सन्न से दरवाजे पर खड़े रह जाते हैं फिर एक प्यारी सी मुस्कान के साथ कहते हैं- " तू तो जानते ह की अभी केतना भीड़ बा रोपनी के, बड़ी मान मनऊवत करला पर मुश्किल से चार गो मिलल हथु। लेकिन लुकमा, कलेवा के बादो डेढ़ सेर नई दू सेर मजूरी लेतथू। रोपनी मिलने की बात सुनते ही दादी के चेहरे का भाव पलभर में बदल जाता है। ऐसा लगता है मानो उसे कोई बड़ी उपलब्धि, बड़ी खुशी हाथ लग गयी हो। वो दादा जी को बोलती है अरे जल्दी ओहनी के खेत पर ले के जा, पहिलहीं ढेर कुबेर हो गईल बा। आऊ अभी तो कुछ बनल न हन, तो घईला में बूट-जौ के सातू बा ऊ डलिया में ले के प्याज नून मिचाई आऊ आम के अचार ले के जा। ओहनी तबतक लुकमा कर लिहें, आऊ हम दुपहरिया में अज़ान के बेरा तक कलेवा बना के खेते पर ले के आ जाईब। इतना सब कुछ दादी इतनी तेजी से बोले जा रही थी, मानो कोई हाई स्पीड ट्रेन नहीं रुकने वाले स्टेशन से गुजर रही हो।
अब तक घड़ी नौ के पार का समय बताने लगती है और हम स्कूल के लिए घर से निकलते हैं। कच्ची सड़क का वो रास्ता और रास्ते के दोनों तरफ धान के खेत और उन खेतों में हर तरफ गाँव का हर आदमी घर को छोड़ अपने हल-बैल कुदाल लिए मिट्टी पानी और कीचड़ में सना पड़ा, अपने खेतों में खेती के लिए लगा दिखाई देता है। वहीं दूसरी ओर रोपा के लिए तैयार खेतो में कतारबद्ध रोपनियों का रोपाई गीत (धन रोपनी गीत) का मधुर स्वर साफ सुनाई पड़ रहा है। और उनका मशीन की गति से रोपाई का काम मन को मोह रहा है। इन मनोरम दृश्यों को निहारते-निहारते कब अपना स्कूल पहुँच जाता हूँ कुछ पता ही नही चलता।
इन सब के बीच स्कूल जाते जाते बार बार दादी का कहा हुआ एक बात स्मरण हो रहा है कि "बस आज भर के रोपा बा, आज रोपा गईल तो उठारो बा। #उठारो (बहुलावन) शब्द से मन में खुशियों का लहर हिलोरें ले रहा था, क्यूंकि वजह यह थी कि आज रात दादी स्वादिष्ट पकवान मालपुआ, पूड़ी-कचौड़ी, केरा-दुधौरी और आलूदम कि सब्जी बनायेगी। बस लग रहा था कि कब स्कूल से छुट्टी हो जाये। स्कूल की छुट्टी होते ही #उठारो की ख्वाब में खोये दादी के पास आकर सबसे पहले पूछने लगते हैं दादी आज #उठारो हउ न। उस समय दादी के चेहरे पर खुशी के जो भाव भंगिमाएँ झलक रही थी उसका वर्णन शब्दों में कर पाना संभव नहीं है,जिससे हम भी मारे खुशी के फुले नहीं समा रहे थे। शाम को जब खेलने निकले सभी बच्चों के बीच बस एक ही बात बताते चल रहे थे आज हमर #उठारो हऊ।
वाकई क्या दिन थे वो जब खेती हमारे लिए एक उत्सव हुआ करती थी। हमारी लाइफ लाईन बस खेती ही थी। खेत तो आज भी हैं पर किसी को अब वो उत्सुकता नही है। कोई खेती करने को राजी नहीं हैं, खेती-बाड़ी को आज निकृष्ट समझा जा रहा है, हम उदासीन हो चुके हैं कृषि के प्रति। सोचते हैं अगर हो गया तो ठीक और नहीं हुआ तो भी कोई बात नहीं। आज हम किसानी की तुलना करने लगे हैं एक व्यवसाय के रूप में पर धरती माँ है और उसकी उपज है कृषि। वो माँ के प्यार वात्सल्य की तरह ही अतुलनीय है। सुख सुविधापूर्ण, विलासिता पूर्ण जीवन के लिए तो उद्योग-धंधे, कल-कारखाने, व्यपार-व्यवसाय, नौकरी-चाकरी सब हैं, पर जीवन की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति, पेट भरने का काम तो अन्न से ही होगा।
राकेश गोस्वामी

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