(अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका सेतु में प्रकाशित डॉ
Govind Madhaw
का आलेख) विष साँपों के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह तो आप समझ ही गए होंगे। इसीलिए साँप जल्दी किसी पर विष का प्रयोग नहीं करते बल्कि शिकार के लिए बचा के रखते हैं। अगर साँप बहुत दिन से भूखे हों तो जाहिर सी बात है उनकी विषग्रंथि भरी हुई होगी और विषदंत जहाँ भी लगेंगे, अधिक मात्रा में विष इंजेक्ट करेंगे।
वैस्कुलोटॉक्सिक साँपों में सबसे कॉमन और खतरनाक नाम है ‘वाइपर’। इन्हें भारत में जाड़ा बहिरा, सियारचंदा, पत्थरचट्टा, चित्तेबरवा, कौड़िया आदि नामों से जाना जाता है। चित्र में आप देख सकते हैं कि नाम के अनुरूप ही इनके शरीर पर गोल-गोल सिक्के जैसे निशान बने होते हैं। ये पथरीले इलाकों, चट्टानों या निर्जन स्थानों पर रहते हैं। ये बहुत ही सुस्त और शांत साँप हैं। मनुष्यों से दूर ही रहते हैं। अक्सर सड़क पार करते समय गलती से इनके ऊपर पैर पड़ जाने से ये आत्मरक्षा में काट लेते हैं।
वैस्कुलोटॉक्सिक विष शिकार के शरीर में प्रवेश करते ही ऊतकों को गलाना शुरू कर देता है। इसीलिए घाव के स्थान पर सूजन और दर्द शुरू हो जाता है जो लगातार बढ़ता ही जाता है। रक्त कोशिकाएं टूटने लगती है, छिन्न-भिन्न रक्तकण रक्तवाहिकाओं के प्रवाह में उथल-पुथल मचा देते हैं, खून में ‘द्रव और ठोस कणों के बीच का संतुलन’ बिगड़ जाता है, कहीं खून जमने लगता है तो कहीं से बहने लगता है। रक्तवाहिकाओं यानी धमनी और शिराओं की दीवार भी तहस-नहस होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप रक्तचाप (ब्लडप्रेसर) लगातार कम होने लगता है, इस स्थिति को ‘हाइपोटेंसिव शॉक’ कहते हैं। जब रक्तचाप ही नहीं तो रक्त का प्रवाह कैसे हो? शरीर के शेष अंगों में पर्याप्त खून और उसमें घुले ग्लूकोस, ऑक्सीजन आदि की आपूर्ति कम होने लगती है, परिणामस्वरूप अंग एक-एक करके तबाह होने लगते हैं। नष्ट होते ऊतकों के टुकड़े किडनी (गुर्दे) की संकरी धमनियों और केशिकाओं में अटक जाते हैं, परिणामस्वरूप ‘किडनी फेलियर’। मेडिकल भाषा में इसे ‘एक्यूट रेनल फेलियर’ या ‘एक्यूट किडनी इंजरी’ भी कहते हैं, एक्यूट इसीलिए क्योंकि सब कुछ अचानक से हो जाता है। किडनी का मुख्य काम है शरीर के जल-वार्धक्य के साथ यूरिया और अन्य उत्सर्जी हानिकारक पदार्थों को मूत्ररूप में बाहर निकालना। किडनी फेलियर की स्थिति में मूत्रनिर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है तो शरीर में पानी जमा होने लगता है, शरीर फूलने लगता है। हानिकारक यूरिया आदि रसायन शरीर के आंतरिक क्रियाकलाप में बाधा पहुँचाने लगते हैं, हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े आदि प्रभावित होने लगते हैं। त्वचा पर लाल चकत्ते आ सकते हैं, लाल पेशाब निकल सकता है। वैस्कुलोटॉक्सिक सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति के खून को निकालकर अगर एक परखनली या वायल में छोड़ दिया जाये तो 20 मिनट के बाद भी ये खून नहीं जमता, द्रव ही बना रहता है, ट्यूब को उलटने पलटने पर पानी की तरह सरकता है। जबकि स्वस्थ व्यक्ति या विषहीन सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति का खून 20 मिनट में जम जाता है, उलटने पर सिर्फ सीरम ही सरकता है, रक्तकण और प्लाज्मा पेंदी में चिपके होते हैं। इस साधारण से टेस्ट से हम कितनी आसानी से और बड़े कम समय में ही यह महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर लेते हैं कि वैस्कुलोटॉक्सिन शरीर में प्रविष्ट हुआ है या नहीं। हालाँकि ऊपर बताये अन्य लक्षणों पर भी गौर करना बहुत आवश्यक है। एक और बात, कई बार लोग सर्पदंश के घाव के ठीक ऊपर अंग को रस्सी से बांध देते है, इस से विष का प्रसार तो नहीं ही रुकता बल्कि वहाँ रक्त प्रवाह रुकने के कारण ऐसे ही सूजन बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में डॉक्टर के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि ये सूजन विष की वजह से है या बंधने की वजह से। कुछ लोग घाव में ब्लेड या किसी दूसरे नुकीले औजार से चीरा लगा देते है, इस विश्वास से कि विष खून के साथ बह जायेगा। विष तो नहीं बहता, उल्टे बहता खून विष के प्रभाव को देखने में बाधा उत्पन्न करता है, घाव में इन्फेक्शन, टेटनस आदि जैसे गंभीर परिणामों का खतरा बढ़ता है सो अलग से। अगर पीड़ित का कुछ फायदा ही पहुँचाना है तो बस इतना कर सकते हैं कि सर्पदंश के तुरंत बाद घाव को साफ़ पानी से धो सकते हैं, अंग को सीधा इस तरह रख सकते हैं ताकि वह ज्यादा हिले-डुले नहीं, मरीज को ज्यादा से ज्यादा पानी पिला सकते हैं। हालाँकि एक समय-सीमा के बाद ये सब भी हानिकारक हो सकते हैं इसीलिए जल्द से जल्द डॉक्टर के पास पहुँचने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए।
वैस्कुलोटॉक्सिक विष-प्रभाव की गंभीरता के हिसाब से डॉक्टर पीड़ित को टेटनस का टीका, दर्दनिवारक सुई, संक्रमण रोकने के लिए एंटीबायोटिक, रक्तचाप बढ़ने के लिए आइवी फ्लूइड में डोपामिन- नॉर एड्रीनलीन, खून में गड़बड़ी जैसे हेमोलिसिस या डीआईसी जैसी जानलेवा स्थिति के उपचार के लिए ताजा खून या प्लाज्मा आदि देते हैं। किडनी फेलियर की स्थिति में डायलिसिस की भी आवश्यकता पड़ती है। कभी कभी गैंग्रीन बन जाने की स्थिति में पैर या हाथ जैसे अंगों को काटने की भी नौबत आ जाती है। लेकिन जो सबसे आवश्यक उपचार है वह है- ‘एंटीटॉक्सिन’ जिसकी चर्चा हम आगे करने वाले हैं। यहाँ बस इतना समझ लें कि समय पर इलाज शुरू हो जाए तो करीब 98 प्रतिशत मरीज बचाए जा सकते हैं।
अगले भाग में चर्चा न्यूरोटॉक्सिक सर्प यानी करैत और कोबरा की...
(क्रमशः)
#ठेठ_पलामू की प्रस्तुति
सेतु जुलाई 2018 अंक से साभार

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