अगर आप पलामू के है और गाड़ियों पर नजर दौड़ाते हैं तो एक नाम अक़्सर आपको गाड़ियों में लिखा मिल जायेगा "शोखा बाबा की जय"। कभी सोचे है कि कहाँ हैं ये शोखा बाबा? नहीं न तो चलिये आज हम आपको बताते हैं शोखा बाबा की कहानी।
शोखा बाबा का मन्दिर पलामू जिलान्तर्गत तोलरा के देवकूर धाम में स्थित है। देवकूर देवक्षेत्र के पास अलग-अलग जगहों से लाकर सैकड़ों वर्ष पूर्व विभिन्न देवी-देवताओं को स्थापित किया गया था। देवकूर में स्थापित पांच देवी- देवताओं में शोखा बाबा, गजाधार बाबा, लंगड़ा बाबा, बजरंग बली और कामख्या देवी प्रमुख हैं। देवकूर धाम पर वर्ष में तीन बार विशेष पूजा अर्चना का आयोजन किया जाता है। ये तीन समय होते हैं, दशहरा, होली और सावन सप्तमी। दशहरा में अष्टमी का दिन विशेष रूप से महात्म्य का दिन होता है। इस दिन आसपास के दर्जनों गांव के लोग दुख, बाधा और भूत-पिशाच की छाया तंत्र-मंत्र और टोटकों से छुटकारा पाने की चाह लेकर यहां आते हैं। लोगों के लिए यह दिन मन्नते मांगने और मुराद पूरा होने के एवज में बाबा के पूजा का दिन होता है। देवकूर में स्थापित सभी देवताओं की अपनी-अपनी महत्ता और कथा रही हैं। लेकिन इस धाम केे देवताओं में सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय देवता शोखा बाबा रहे हैं। बल्कि यह कहा जाये कि देवकूर यानी शोखा बाबा तो शायद कोई अतिश्ंयोक्ति नहीं होगा।
इस संबंध में प्रचलित दंत कथाओं के अनुसार सैकड़ों वर्ष पूर्व जब तोलरा गांव में मार्ह मारिन(आदिम जनजाति ) के लोग रहा करते थे। सरयू पार के एक ब्राह्मण परिवार घूमते-घूमते यहां पहुँचा। वह ब्राह्मण अपने लड़के की बीमारी से परेशान था। इसी बीच एक रात जब वह सोया था, उसे स्वप्न में एक देवता ने अपनी मुक्ति के एवज में उसके पुत्र को ठीक करने की बात कही। स्वप्न में देवता ने ब्राह्मण को अपनी मुक्ति का रास्ता भी बताया। ब्राह्मण ने स्वप्न के अनुसार योजनाबद्ध तरीके से कार्य करने का निश्चय किया। धीरे-धीरे ब्राह्मण का लड़का ठीक हो गया और ब्राह्मण ने उसी गांव में अब अपनी स्थायी कुटिया भी बना ली। फिर धीरे-धीरे उसने अपनी वृति के अनुसार कार्य भी करना शुरू कर दिया। ब्राह्मण के व्यवहार से प्रभावित होकर गांव के प्रमुख ने भी उसे अपना पुरोहित बना लिया। आखिर वह समय भी आया जब ब्राह्मण को अपनी मनंवाछित गुरू दक्षिणा मांगने की बारी आयी। ब्राह्मण ने गुरू दक्षिणा में वही चीजें मांगी जो उसे स्वप्न में बताया गया था। स्वप्न में आये देवता ने ब्राह्मण को जो स्वप्न में जो बात कही गई थी प्रमुख द्वारा हाँ कहने के साथ ही उसने उसी वक्त गांव छोड़ने का भी निर्णय ले लिया। क्योंकि मान्यता के अनुसार देवता के मुक्त होते ही उसका विनाश अवश्यंभावी हो गया था। वस्तुतः प्रमुख ने जिस देवता को बंधक बनाया था वह शोखा बाबा ही थे। जिन्हे दास बनाये रखने तक ही उनमें स्मृद्धि कायम थी। इस तरह मार-मारिन के यहां से चले जाने के बाद से ही शोखा बाबा यहां के लोगों के लिए पूज्य हो गये। वह परंपरा आज भी कायम है।
ऐसा माना जाता है कि आज भी अष्टमी के दिन पुजारी पर शोखा बाबा की छाया आती है और वे ही ‘बामर’ के रूप में लोगों की मन्नते पूरी करते हैं। ‘बामर’ में पूजारी घी से भरा हुआ एक पात्र (ढक्नी) लेकर उसमें बाती डालकर उसे जला लेता है और उसे दुख तथा पैशाचित शक्ति के प्रभाव से प्रभावित व्यक्ति पर फूंक मारकर जलते हुए घी का फुहारा छोड़ता है। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति पर किसी पैशाचित आत्मा का प्रभाव होता है उस व्यक्ति का शरीर घी की फुहार से जल जाता है, जबकि बाकी लोगों को घी का फुहार नहीं जलाता। अब यदि कभी इन सब बातों को देखना चाहते हो तो दसहरा के समय अष्टमी को जरूर पधारें।
शोखा बाबा की कृपा ही है कि यहाँ गाँव के लोग इसरो साइंटिस्ट से लेकर डी एस पी तक हैं पर सबसे बड़ी बात ये है कि इस गाँव का कोई घर ऐसा नहीं है जिस घर से कोई न कोई फोर्स में न हो। शोखा बाबा की जय हो ।
By: Ranjan Tiwary

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