Saturday, January 2, 2021

दहेज प्रथा

बड़े दिनों के बाद अपनी दीदी के घर जाना हुआ। बाहर बैठा उनके ससुर के साथ रेड़मा गांव की पंचायती राजनीति पर चर्चा में मशगूल था और गोद में छः वर्षीय भगिना ब्राह्मण धमाचौकड़ी मचा रहे थे। तभी दीदी ने मुझे अन्दर किचन से आवाज लगाई। " हलवा बना देले हियाऊ तोहरा ला, तनी सुन सेराए दे फिर अपन आउ बाबूजी ला प्लेट ले ले जो।"
मैंने दीदी कि बातों को अनसुना कर बालवीर को वहीं नीचे उतार दिया और किचेन की रैक से आम का अचार निकालने लगा। तभी बालवीर ने नीचे की रैक पर रखी लहसुन, प्याज के साथ अपनी पुरानी दोस्ती निभानी शुरू कर दी। पूरे किचेन में गंदगी फैलने लगी। मगर मजाल दीदी की तो कानों पर जूं भी नहीं रेंग रहा था। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने हल्के से बालवीर को डपट लगाई।
" ननानानाना मत डातिहे एकलौता ना हऊ, फिर चिलियाए लगतऊ, सब लोग कपर पे चढ़ा के रखले हंथू।" दीदी ने कहा।"एकलौता" मेरे दिमाग में आवाज गूंजने लगा।
सच्चाई ये थी कि दीदी की दो बेटियां और एक बेटा था पर उनके नजर में सिर्फ बेटा ही गिनने लायक औलाद होती है।
दीदी के ससुर के पास काफी जमीन नेशनल हाइवे के किनारे लगी हुई थी। और आज के समय में उनके परिवार की हैसियत रेड़मा के चंद अमीर आसामियों में होती है। हाल ही में उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को कम उम्र में ही एक सरकारी ऑफिसर के साथ भारी दहेज़ दे कर विदा किया था। मैंने हालचाल जानने वस पूछा "तब दामाद जी कईसन हथुं? " "का बतईयउ पहुना ता एकदम हीरा हथु, लेकिन बियाह में तोर जीजाजी के पूरा बैंक एकाउंट खाली हो गइल।"
सुन कर मेरा माथा चकराने लगा। इस परिवार के पास अभी भी अकूत दौलत है , मुश्किल से इन्होंने अपने हैसियत के दो चार प्रतिशत खर्च किया होगा बेटी की शादी में, फिर भी रोना। कहां तो उस मासूम लड़की का एक तिहाई हिस्सा बनता था पूरी पुस्तैनी जायदाद में, पर सारा तो इस इकलौते पुत्र बालवीर जी का है ना।
आज पूरे समाज का यही हाल है कोई भी अपनी बेटी को अपना वारिस नहीं समझता है। सारे लोगों को यही लगता है, एक बार लमसम पैसा दे दिया तो बेटी का हिस्सा खत्म। कब तक इस पुरातन व्यवस्था में जीयेंगे हमलोग? क्यों ना पुस्तैनी सम्पत्ति बंटवारे में बेटियों का हक शादी के वक़्त ही निर्धारित किया जाए? ताकि दहेज़ रूपी दानव को जड़ से खत्म किया जा सके। हमारी बेटियों को उनका पूरा, जी हां पूरा हक दिया जा सके।
खुद एक बार विचार कर के देखिए कितनी गुंजाइश है इस नये सोच में। मुश्किल है अपने जंग लगे सोच से बाहर निकलना पर असंभव कतापी नहीं।
अपने विचार जरूर शेयर करें।
तर्क करें लेकिन कुतर्क नहीं।
By: Sunny shukla
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