लगभग प्रत्येक गांव के आबाद होने की कहानी में यह बात उभरकर सामने आती है कि पहले के राजा अपने इलाके के प्रतिभाशाली लोगों को ईनाम के तौर पर गांव या जमींदारी से नवाजते थें। इसी क्रम में पलामू में भी विद्वान ब्राह्मणों को दानस्वरुप जमीन देकर बसाने की परंपरा रही है।
तकरीबन #300 साल पहले पलामू के दानवीर राजा मेदिनीराय ने हमारे पूर्वज #स्व.पतिधर दूबे बाबा को यह गांव दान में दिया था जो आज पूरबडीहा के नाम से प्रसिद्ध है। अपने बुजुर्गों से हमने सुना है कि हमारे पूर्वज उत्तर प्रदेश के #गोरखपुर से यहाँ आए थें,जो कि #धर उपनाम लगाते थे। आज भी हमारे गांव के कुछ लोग उसी परंपरा का पालन करते हुये"धर"उपनाम से अपने नाम की शोभा बढ़ाते हैं।
हमारा गांव पलामू की जीवन रेखा से प्रसिद्ध कोयल नदी के किनारे बसा हुआ है।आम लोग के बोल-चाल की भाषा में इसे पट्टी-घारा नाम से भी जाना जाता है। नदी किनारे स्थित होने से यहाँ सिंचाई की बढ़िया सुविधा है। इसलिए सभी लोगों की अच्छी खेती-बाड़ी है। लगभग सबके खेतों में अच्छी उपज हो जाती है।इसलिए घर- गृहस्थी के मामले में गांव के सभी लोग सम्पन्न हैं।
यहाँ के लोग मेहनती हैं,साहसी हैं और शक्तिशाली हैं। शायद इसी कारण से यहाँ के लोगों की नेतृत्व क्षमता, दबंगई और पहलवानी पलामू जिले में प्रसिद्ध है।यह भी कहा जा सकता है कि यहाँ पर छोटों से लेकर बड़ों तक, सभी में राजनीति के लिये आवश्यक सभी गुण दिखलाई पड़ते हैं।इसी के साथ यहाँ के लोग मिल-जुलकर और संगठित भी रहते हैं। शायद इसीलिये पूरबडीहा को एकता के प्रतीक गांव के रुप में भी जाना जाता है।
पूरबडीहा में पूरे गाँव के निवासी एक ही वंशज से उत्पन्न हुए हैं तो हमारी भाषा में हम गांव के सभी लोग एक दूसरे के #गोतिया हैं।गोतिया की संख्या ज्यादा होने से ढ़ेर सारे फायदे हैं।गांव के किसी भी परिवार के यहाँ मांगलिक कार्यक्रम में खूब चहल पहल होती है।एक दूसरे के सुख दुख में पूरा गांव एकत्रित हो जाता है।गांव में किसी परिवार के शादी-विवाह,मड़वा-चउठारी आदि मांगलिक कार्यक्रम में अगर सिर्फ चावल बनाने की बात करें तो कम से कम एक #क्विंटल चावल की खपत होना यहाँ सामान्य सी बात है।
हम सभी त्यौहारों को धूमधाम से मनाते हैं किन्तु गांव में खुशी के साथ दुख भी बराबर भाव से आता है। ज्यादा गोतिया होने के कारण लगभग सभी मुख्य पर्व-त्यौहार के समय गांव में किसी न किसी परिवार के यहाँ शोक हो जाता है जिससे हमलोग अधिकांश समय में छुतका में ही होते हैं लेकिन सब कुछ ठीक ठाक रहा तो खुशी मनाने में हम सभी सबसे आगे रहते हैं।"अब क्या है कि मरनी-जीनी ई सब कोई पर्व त्योहार देख कर थोड़े न होता है।"-ग्रामीण संस्कार है और हम लोग प्रत्येक के सुख-दुःख में बराबर की भागीदारी निभाते है,सो एतना लंबा चौड़ा गोतिया और ऊपर से सबके घर में आपसी प्रेम तो इ सब भी तो जरूरी न है।
हमारे गांव में कोयल नदी के किनारे मकर संक्रांति पर लगने वाला शानदार मेला और वहाँ आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम बहुत प्रसिद्ध है जिसमें आसपास के ही नहीं बल्कि दूर-दूर के बहुत लोग एकत्रित होते हैं। यहाँ पर रामनवमी के समय #लाठा-लाठी का भी विशेष महत्व है जिसे यहाँ के युवाओं के शक्तिप्रदर्शन के और शारीरिक कौशल कला के प्रतीक के रुप में देखा जाता है।
यहाँ पर सामूहिक प्रयास से प्रयास से यज्ञ जैसे धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहता है।ऐसे धार्मिक आयोजनों में चंदा काटने से लेकर #कलशयात्रा, फेरी देना, शर्बत पिलाना और शाम को प्रवचन सुनने और सभी व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने में यहाँ के युवाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी हमेशा प्रशंसनीय रहती है।
हमारे गांव के निवासी आदर सत्कार करने के मामले में सबसे आगे रहते हैं।शायद इसीलिए सगे-संबंधियों में हमारा गांव हमेशा अव्वल था, है और हमेशा रहेगा भी....। इसीलिए सहीए कहा गया है कि "पलामू के कौनो अइसन गाँव नहीं है जवन गांव के रिश्तेदारी हमार गाँव(पूरबडीहा)मे नहीं मिलेगा।"
हमारे गांव का नामकरण सूर्य देव के उदित होने की पवित्र पूर्व दिशा के नामपर किया गया है इसीलिये यहाँ के निवसियों पर हमेशा आदित्य बाबा का आशीर्वाद बना रहता है। अब #ठेठ पलामू पर पूरबडीहा की कहानी आने पर आप सब देखिएगा कि हमारा हौसला बढ़ाने वाले कितने अच्छे-अच्छे कमेंट आएंगे।
जय पूरबडीहा।जय पलामू।जय भारत
मैं ठेठ पलामू का नियमित पाठक हूँ । और आभारी हूँ ठेठ पलामू का जिसने #फूललोढ़ी को विशेष महत्व दिया, जो हमारे बहन-बेटियों के द्वारा मनाया जाता है।
दया दुबे & कौटिल्य द्विवेदी

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