(अंतरराष्ट्रीय हिंदी पत्रिका #सेतु में प्रकाशित Dr.
Govind Madhaw
का आलेख)अगर किसी को साँप काट ले तो क्या करना चाहिए? उसके पहले आइये इस मिथक से पर्दा उठायें कि हर साँप जहरीला और खतरनाक ही होता है। ज्यादातर साँप जहरीले नहीं होते, और ये भी आवश्यक नहीं कि विषधर साँप के काटने से भी हमारे शरीर में विष प्रविष्ट हुआ ही हो। लगभग 60 से 70 फीसदी लोग सिर्फ और सिर्फ डर के मारे घबराये होते हैं और उनमें मात्र घबराहट के लक्षण होते हैं।
कौन-कौन से साँप जहरीले हैं? चार कुख्यात नाम हैं - करैत, कोबरा, रसेल वाईपर और स्केल वाईपर। हमारे देश में सिर्फ इन चार प्रकार के साँप 95 फीसदी विषयुक्त सर्पदंश के कारण बनते हैं। खारे पानी में रहने वाले सभी साँप जहरीले होते हैं जबकि मीठे पानी में रहने वाले एकदम विषहीन। जलीय साँपों की पूंछ तैरने में सहायता करने के उद्देश्य से चिपटी होती है इसीलिए बहुत बार लोग इन्हें मछली भी समझ लेटे हैं। स्थलीय साँपों में विषधर और विषहीन में विभेद करने के लिए हमें उनकी शारीरिक बनावट को ध्यान से देखना होता है। विषधर साँपों के सर तिकोने आकार में पीछे फैले हुए होते हैं जबकि विषहीन साँपों में ये गोलाकार। आंख की पुतली सामान्यतः गोल होती है सभी जीवों में, मगर विषधर साँपों में यह स्लिट शेप्ड यानी पतली दरारनुमा होती है। अगर पेट की त्वचा में धारीदार स्केल्स की एक से अधिक पंक्तियाँ हों तो लगभग साँप विषहीन होते हैं जबकि विषधर साँपों के पेट में स्केल की एक ही पंक्ति होती है। साथ लगे चित्र में इसे देखा जा सकता है। विषधर साँपों के ऊपरी जबड़े में पंक्तिबद्ध दांतों के अलावा पीछे की और मुड़े हुए तथा अन्य दांतों से काफी लम्बे दो ‘विषदंत’ यानी ‘फैंग’ होते हैं। इसीलिए विषधर सर्पदंश के घाव यानी दांतों के निशान (बाइट-मार्क) में विषदंत के निशान मौजूद होते हैं। चित्र में इसे भी ध्यान से देखें, यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है सर्पदंश की गंभीरता का अंदाजा लगाने के लिहाज से।
विष यानी ‘स्नेक वेनम’ असल में है क्या और साँपों में विष क्यों होता है? विषहीन साँप तेज भागने में सक्षम होते हैं, अपने शिकार को जबड़े में जकड़ने के बाद उसके चहुँ-ओर लिपटकर उसे दम घोंटकर मार देते हैं। मरे हुए शिकार को निगलना आसान होता है। मगर सभी साँप इतने फुर्तीले और ताकतवर नहीं होते। इसीलिए प्रकृति ने उन्हें विषदंत प्रदान किया है। ऊपरी जबड़े में लगे दो विषदंत एक विशेष प्रकार की लार ग्रंथि से निकलने वाले रसायन को शिकार के शरीर में पहुँचाने वाले इंजेक्शन मात्र हैं। लार ग्रंथि हमारे पास भी है, और उससे निकलते लार में कई तरह के प्रोटीन निर्मित एंजाइम होते हैं जो भोजन को पचाने में मदद करते हैं। पाचन है क्या - खाद्य पदार्थ में मौजूद बड़े कणों को छोटे कणों में तोडना, फिर बड़े अणुओं वाले यौगिक-रसायनों को छोटे अणुओं में बदलना ताकि वे रक्त प्रवाह में शामिल होकर हर कोशिका तक पहुँच पायें और फिर ऑक्सीजन से अभिक्रिया कर के उर्जा यानी ATP पैदा कर सकें। बड़े मांसाहारी जानवरों के पास तो हाथ-पैर और बड़े जबड़े हैं जिनकी सहायता से वे मांस को नोच-खसोट कर और चबा-चबा कर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल लेते हैं। फिर लार में मौजूद एंजाइम बड़े अणुओं को तोड़ना प्रारंभ कर देते हैं। मगर असली पाचन की प्रक्रिया पेट में होती है जहाँ अमाशय की मांसपेशियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल और अन्य रसायनों की मदद से ठोस भोजन को द्रवित ‘काइम’ यानी एक तरह के सूप में बदल देती है। मगर बेचारे साँप उन्हें तो शिकार साबुत ही निगलना होता है। अमाशय की जगह पूरे धड़ में एंठन पैदा करना पड़ता है। इसीलिए उन्हें ऐसे रसायनों की आवश्यकता होती है जो निगलने के पहले से ही भोजन को ‘तोड़ना’ और ‘गतिहीन’ करना शुरू कर दे। इन दोनों शब्दों पर ध्यान दें। दरअसल विष के भी मुख्यतः यही दो काम होते हैं- शिकार के शरीर को तोडना और शिकार को गतिहीन यानी पैरालाइज़ करना। हर साँप काविष कमोबेश इन्ही में से किसी एक काम के लिए बना होता है। इस आधार पर हम विषधर सर्पों का वर्गीकरण ऐसे करते हैं - ‘वैस्कुलोटॉक्सिक’ और ‘न्यूरोटॉक्सिक’।
(क्रमशः...)
#ठेठ_पलामू की प्रस्तुति
सेतु जुलाई 2018 अंक से साभार.


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