Saturday, January 2, 2021

पचाठ

 घरे बतीआइत हली माई से बतावे लगल कि 4 -5 दिन से जे पानी लगाइले बा से खुलते नइखे। हम कहली कि तब तो रोपा-ढोबा शुरू हो गईल होतई सबके। तो कहे लगल कि का जनी अब जेकर -जेकर होवेला होतई ओकर होईये गइल होतई। हमरा सुने में अजिब लगल हम पुछली माई से जेकर-जेकर मने हमीन के धान अबकी नखई रोपाइत का? तो कहे लगल अब अपने खेती थोड़े न होव हई, बँटईया न लग जा है। अब उ सब के मन जब रोपेला होतई रोपतथी, हमीन के पतो थोड़े चलतऊ। अब पहिलका जमाना थोड़े रह गेलइ जे 'पचाठ' धूम-धाम से होतई। 'पचाठ' ई का होवेला गे? हमहूँ ताज़्जुब से पूछली तो बतावे लगल ...

रोपा जवन दिन शुरू होला ओकरा 'पचाठ' कहल जाला।पहिले जवन दिन रोपा शुरू होव हलक उ दिन घरे अलगे ख़ुशी रह हलक। आउ होइबो काहे न करतक, आखिर किसान-खेतिहर परिवार में सबसे खुशी के दिन एकर से बड़का का हो सकेला? ई दिन धेरे मानी रोपनी सब गीत गा गा के धन रोपनी शुरू करतन। आउ सांझी पहर जब रोपनी ख़तम हो जइतक। तब सब धान के बिहन मुठी में ले ले के, उहे कदईये वाला हाथे घरे गीत गईते आव हलन। का मजे के अंगना में लान के सब झूमर तरी झुंड बना नचतन। आउ एक-एक कर के सब हमीन गोतनी सब निकल हली। रोपनी सब जे आपन साथे बिहन लान हलन, उहे गोड़ में पायल जइसन बाँध हलन। ओकर बाद दादी गिनती से जेतना रहतन सब ला तेल आउ टिकुली,सेनुर, फीता ईसब सृंगार के समान रखले रह हलन। आउ हमीन सब गोतनी सब से बारी- बारी से सब के देवअइतन। सब के एतना समान देवल जा हलक शुरू दिन कि अब तो रोज-रोज रोपा लगबे करी। आउ सब रोपनी सब गन्दा होइबे करीहें। तो जब घरे जाथ रोपा ख़तम कर के तो फिर से अपन साजो सृंगार करथ। आउ हमीन सब से देवावल जा हलक काहे कि ईसब सोहाग के चीज न रह हलक। अइसन सब कह हलन कि दोसर के सोहाग-भाग के चीज बाँटला से अपन सोहाग-भाग भी बढेला। ओइसे तो शुरू दिन ओतना खाये पिये के झँझट ना रह हलक। जे अपन लुकमा-कलेवा जा हलक सब के उहे तबो दादी के मन मानो तब न। कुछ न कुछ मंगा के मिठाई जरूर रखतन आउ ई बात के असरो सब लगा के रख हलन कि हमर घर के पचाठ बा मने आउ सब घर से अलगे ही रही। तबे तो जइसहीं पता चलतक कि हमर घर रोपा लगेला बा तो बुलावल जाइत 15 गो तो 5 -7 गो हमेसा बेसिये आ जा हलन। अब सब के इहो पाता रह हलक कि जादे होइला से कोई भेजी न घरे इहाँ से।
अब तो ना उ खेतीये रह गेलक, न खेतिहर किसान आधा अकाल के चलते खेती करब छोड़ देलन, आउ आधा समय के अभाव में बंटाईदार के दे देले हथ। ट्रेक्टर से खेती आउ पैसा से रोपनी इहे चलन चलईत बा। उहो रोपनी खोजलो से ना मिलथ कहाँ से मिलथ।
अपन-अपन मर्दाना साथे चल गइल हथ सब पंजाब कमाये।
तो के रोपी धान, के गावे गीत,
के सेनुर टिकुली ला पचाठ मनाये।।
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You, Anand Keshaw, Himanshu Kumar and 272 others
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