Saturday, January 2, 2021

अठकठ दाँत

सनातन धर्म में संस्कारों का बहुत महत्त्व है। जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसे तो 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है लेकिन इनके अतिरिक्त भी बहुत से संस्कार होते हैं, जो हमारे समाज के लोगों द्वारा बनाए जाते है। अब मैं अपनी ही बात करती हूँ बचपन में जब हम भाई बहनों के दूध के दाँत टूट जाते तो उन्हें हम फेंकते नहीं थे, बल्कि अरवा चावल के साथ दूब घास के पास गाड़ देते थे ताकि हमारा दाँत अच्छा जामे। हमारी आजी कहती खपड़ा पर दाँत फेकने से खपड़दत हो जाएंगे, बांस के पास फेंक देने से बंसिलदाँत और अन्हेरी फेंक देने से उबड़ खाबड़ दाँत जामता है। हमलोग अपनी मंझली दीदी को चिढ़ाते थे कि तुम खपड़ा पर बिग दी थी ना अपना दाँत, इसलिए बढ़का दाँत जाम गया। दाँत से जुड़ा एक और खेला है। हमारे यहाँ गढ़वा-पलामू में बाबु-मइयाँ के दूध के दाँत जामने से जुड़ा हुआ भी एक खीसा है। इसके अनुसार कहा जाता है कि,
" छ्वे-नवे जामे दाँत
कहियो ना घटी दूध-भात।"
यानि अगर दूध के दाँत छठे या नवें माहीने में उगे तो बच्चा भाग्यशाली है उसे कभी खाने पीने की कमी नहीं होती। वही सातवें महीने में दाँत जामने को सामान्य माना जाता है। लेकिन जब दाँत आठवें महीने में जाम जाए तो उसे गरह माना जाता है और सबसे मजेदार तो इस गरह का निवारण है। हमारे चाचा के बेटे का दाँत आठ महीने में जाम गया। पुरे घर में हकरान मच गया सबकोई एक ही बात बतियाये की बबुआ के मामा को बोलाना पड़ेगा और यह गरह हटवाना पड़ेगा। सगुनी पंडित से साइत देखवाया गया। और छोटू मामा को अपने साथ बाबु का कपडा , चांदी का कटोरा, एक केन दही, गुड़ और मिठाई ले कर बुलाया गया। घर में हमारी माँ ,पाँचों चाची और बड़ी दीदी सब मिलजुल कर पुआ , धुस्का ,घुघनी, दहीबाड़ा , केरा-डेरहौरी और पाँच तरह की तरकारी बना के अजवार हो गई। अब बबुआ के नहवा-धोवा के मामा के लानल कपडा पेन्हा दिया गया। अब छोटू मामा के आँख पर गमछी बांध दिया गया और उन्हें बाबु के तरफ पीठ कर के खड़ा कर दिया गया। चाँदी के कटोरे में दही भात और गुड़ साना गया तथा मामा हाथ पीछे कर-कर के बबुआ को पाँच बार खिलाए। सारा नजारा एकदम गजबे था। हमलोग उछल-उछल कर थपड़ी पिट रहे थे। हमारी रिस्ते की फुआ और उनकी गोई सब छोटू मामा का मजाक उड़ा रही थी। गाँव -घर की फुआ मामा की बहनों यानि मेरी माँ- चाची के लिए गाली गा रही थी। पूरा घर हँसी मजाक से सराबोर था। फिर सभी गितिहारिनो को तेल, सेंदुर, खोइच्छा में चावल , गुड़ और मिठाई दे कर विदा किया गया।
हमारी संस्कृति से जुडी यही सबसे बड़ी और खास बात है कि हम छोटी-छोटी बातों में भी बड़ी खुशिया ढूंढ़ लेते है और इन खुशियों को कई गुना बढ़ाने का काम करते हैं हमारे अपने। इन खुशियों में चार चाँद लगाती है हमारी आपस में की गई चुहलबाजियां, तरह-तरह के देशी पकवान, ननद-भउजाई के बीच की सुरीली मीठी गालियां, हर उत्सव के लिए बने अलग-अलग गीत। और जब बात इन खुशियों के आधार की हो तो सबसे पहला नाम आता है बड़े- बूढ़ो के प्रति सम्मान की, अपनी संस्कृति के लिए लगाव और आपसी प्रेम की।
Jaya Dubey
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