सिपाही विद्रोह के समय पलामू में भी दो भाइयों ने क्रांति की ज्वाला जलाए रखी थी। #नीलाम्बर-पीताम्बर खरवार ने, नाम तो हम सब ने सुन रखा है, परन्तु उन्हें कितना जानते-मानते हैं ये अलग सवाल है।
तब पलामू से चेरो वंश की सत्ता समाप्त हो चुकी थी। ठाकुरों ने ठकुराई अपने नाम कर सभी स्वतंत्र रहने वाले जन-जातियों को परेशान करना शुरू कर दिया था। नीलांबर-पीतांबर के नेतृत्व में पूरे पलामू में विद्राेह की ज्वाला धधक रही थी। विद्राेहियाें काे स्थानीय जागीरदाराें तथा अन्य लाेगाें का समर्थन प्राप्त था। इन्हें रांची के प्रमुख क्रांतिकारी #ठाकुर_विश्वनाथ_शाही एवं #पांडेय_गणपत_राय का साथ प्राप्त था।
पलामू के तत्कालीन कमिश्नर #डालटन था, बाद में जिसके नाम पर शहर का नाम #डालटनगंज हुआ। इनसे डरकर कमिश्नर डालटन ने मद्रास इंफेंट्री के 140 सैनिक, रामगढ़ घुड़सवार की छाेटी टुकड़ी तथा पिठाैरिया परगणैत के नेतृत्व में उसके कुछ बंदुकची के साथ 16 जनवरी 1858 काे पलामू के लिए कूच किया। वह 21 जनवरी काे #मनिका पहुंच कर #ले._ग्राहम से मिला एवं दूसरे दिन पलामू किला से विद्राेह का संचालन कर रहे नीलांबर-पीतांबर पर चढ़ाई कर दी। अंग्रेज काफी ताकतवर थे जिसके वजह से क्रांतिकारियों को किला छोड़ना पड़ गया। किला में ही विद्रोहियों को अपना गोला, बारूद, तोप छोड़ कर भागना पड़ गया। अंग्रेजों को वहाँ बाबू #कुंवर_सिंह की चिट्ठी भी प्राप्त हुई जो उन्होंने नीलाम्बर-पीताम्बर को भेजी थी। जिसमें उन्होंने तत्काल मदद करने की बात लिखी थी। जिसे पढ़ अंग्रेज और घबरा गए। और उन्होंने मदद मिलने के पहले विद्रोहियों को खत्म करने की रणनीति बनाई।
डालटन लेस्लीगंज( छावनी) में रुक कर रणनीति बनाने लगा, तथा उसने सभी जागीरदारों को सैन्य सहायता का आदेश किया। लगभग सभी ठाकुर जागीरदारों ने मदद किये परन्तु चेरो जागीरदार #भवानी_बक्श_राय जो पलामू राजा से संबंध रखते थे, उन्होंने मदद देने से साफ इंकार कर दिया। 10 फरवरी 1958 को डालटन ने पलामू के 'हरिनामाड़' गांव मे विद्रोहियों द्वारा अपने विरोधियों पर किए जा रहे करवाई की खबर मिलने पर ले. ग्राहम और रामगढ़ सेना तथा देव राजा को हरिनामाड़ भेज कर उन पर हमला करवाया। तब तीन विद्रोही पकड़े गए, दो को तुंरत फांसी दे दी गई और एक को रास्ता एवं जानकारी प्राप्त करने के उद्द्शेय से उन्होंने साथ रख लिया। विद्रोही बंदी से काफी जानकारी इकठ्ठा हो जाने के बाद शातिर #डालटन ने उसकी मदद से 13 फरवरी 1859 को नीलांबर-पीतांबर के इलाके में जा घुसा। कोयल नदी के पार जंगली टिलहों से छुप कर सभी विद्रोहियों ने अंग्रेजो पर जबरदस्त हमले किए। जिसमें रामगढ़ सेना का एक हवलदार भी मारा गया। परन्तु अंग्रेजों की सेना काफी मजबूत थी जिसकी वजह से नीलांबर-पीतांबर को पीछे हटना पड़ा। #शाहपुर और #बाघमारा में भी विद्रोहियों और अंग्रेजों का आमना-सामना हुआ, जिसमें विद्रोहियों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा। सरकारी आकड़ों के अनुसार विद्रोहियों के 1200 #मवेशी अंग्रेजों ने जब्त कर लिए थे। परन्तु वो नीलांबर-पीतांबर को पकड़ने में उन्हें मुँहकी खानी पड़ी। डालटन की काफी किरकिरी हुई जिससे वो बहुत आहत हुआ,जिसके कारण उसने गुस्से में आकर इनके गढ़ चेमु-सनेया के सनेया के लगभग सभी घरों में लूटपाट कर, घरों को आग के हवाले कर दिया।
जनवरी 1859 में कप्तान #नेशन पलामू पहुंचा और ग्राहम के साथ विद्राेह काे दबाना शुरू कर दिया। तब तक #ब्रिगेडियर_डाेग्लाज ने भी पलामू के विद्राेहियाें के विरुद्ध मुहिम चला दी। #शाहाबाद से आनेवाले विद्रोहियों को राेकने का काम #कर्नल_टर्नर काे साैंपा गया। इस कार्रवाई से पलामू के जागीरदारों ने अंगरेजाें से डर कर नीलांबर-पीतांबर काे सहयाेग देना बंद कर दिया।
अंग्रेजों की एक नीति 'फुट डालो और राज करो' भी थी। जिसका उपयोग उन्होंने यहाँ भी किया। #खरवार और #चेरो को के बीच फुट डालने में अंग्रेज कामयाब हो गए जिसका उन्हें जबरदस्त फायदा मिला। और इस के वजह नीलांबर-पीताम्बर को अपना क्षेत्र छोड़ना पड़ा। चेरों से अलग हो गए खरवार भोग्ताओं पर हमले तेज हो गए, जिससे वो तेजी से कमजोर होते गये। अंग्रेजो के कई मुखबिर दलाल नीलाम्बर-पीताम्बर के पीछे पड़ चुके थे। और नीलाम्बर-पीताम्बर को उनके करीबी संबंधी के घर से गिरफ्तार कर लिया गया। इन क्रांतिकारियों पर मुकदमा तक नहीं चलाया गया और 28 मार्च 1859 को इन्हें #लेस्लीगंज के में एक पेड़ पर फांसी दे दिया गया।
Sunny shukla

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