Saturday, January 2, 2021

रेहट

हमारे जीवन के वे अनमोल पल, जो हम अपने बचपन की मस्ती एवं बेफिक्री में गुजार चुके हैं, उसे हम अब कभी वापस नहीं जी सकते हैं। इन अनमोल पलों को अब स्मृतियों में ही जिया जा सकता है। वह भी यह तभी संभव हो पाता है, जब हमारी आँखों के सामने कोई भी दृश्य या चित्र आकर हमें उन दिनों की याद दिला जाता है और हम अपने आपको उन यादों के सागर में तैरने की खुली छूट दे पाते हैं।
ऐसे ही मुझे अचानक व्हाट्सएप पर किसी ने रेहट का चित्र भेजा और अनायास ही गाँव और बचपन के वे सारे पल स्मृति पटल पर चलने लगे; जैसे मानो अभी कुछ समय पहले की ही तो बात है। उस समय रेहट एवं डीजल पंप का उपयोग सिंचाई के लिए पलामू-गढ़वा के प्राय: सभी गाँवों में होता था। रेहट सिंचाई के लिए सबसे सस्ता एवं सुगम साधन हुआ करता था। ना तो डीजल का खर्च न ही बिजली की चिंता। वैसे भी उस समय इस क्षेत्र के अधिकतर गाँवों में बिजली पहुँची भी नहीं थी। अन्य सभी बच्चों की तरह मेरा भी बचपन अपने गाँव एवं नाना-नानी के गाँव में बीता। जहाँ भी हमें रेहट चलते दिख जाता, हम लोग घंटों उसके सामने खड़े होकर बैलों को रेहट में जोत कर कुआँ से पानी निकालने की प्रक्रिया को बड़ी तन्मयता से निहारा करते थे।
यही दिसंबर-जनवरी का महीना हुआ करता था, गाँव के छोटे-छोटे किसान अपने खेतों में गेहूँ, गन्ना, आलू एवं अन्य मौसमी सब्जियों की सिंचाई के लिए रेहट का उपयोग करते थे। जब हम पाँचवीं-छठीं में पढ़ते थे, तो शैक्षणिक कैलेंडर भी जनवरी से शुरु होकर दिसंबर में खत्म हुआ करता था, इस कारण दिसंबर-जनवरी का महीना हम लोगों के लिए छुट्टी का महीना हुआ करता था। वैसे भी उस समय गाँव के बच्चे पढ़ते ही कितने थे। अतः इस कार्य के लिए हमारे पास पर्याप्त समय हुआ करता था। ऐसे में यदि संयोगवश रेहट में जूते बैलों को हाँकने का मौका मिल गया, तो हम खुशी-खुशी दस-बारह चक्कर बैलों के पीछे-पीछे घूम जाते थे।
आज हमारी जिंदगी अपने गाँव से दूर शहरों में फास्ट लेन में चलती है, जिसमें रुक कर सोचने का मौका बहुत ही कम मिल पाता है। कार्यालय एवं परिवार के बीच संतुलन बनाते हुए तथा भौतिक उपयोग की वस्तुओं का संग्रह करते हुए, कब हमारे जीवन के 10-15 वर्ष निकल जाते हैं पता ही नहीं चलता है। एक भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति होती नहीं है कि हम दूसरे लक्ष्य की प्राप्ति में लग जाते हैं। आज जब हम जिंदगी की तुलना उन दिनों से करते हैं, तो पातें हैं कि हमारा जीवन भी रेहट की तरह मद्धम-मद्धम सुकून के साथ चलता था, जिसमें वैसी ही मिठास होती थी; जैसे- रेहट से सिंचित खेतों में पैदा होने वाले गेहूँ, गन्ना, एवं सब्जियों में रहती थी। एक छोटी-सी दुनिया जिसमें हमारा गाँव लगभग आत्मनिर्भर तो होता ही था और लोगों की आवश्यकताएँ भी सीमित होती थी। इन सब की पूर्ति के लिए ग्रामीण परिवेश में सब कुछ होता था।
जिस तरह से रेहट से सिंचाई की प्रक्रिया चलती है, उसे देख कर बड़ा सुकून मिलता था। इसकी रफ्तार ना तो ज्यादा, न हीं कम होती थी। इस पूरी प्रक्रिया में एक अजीब मिठास का अनुभव होता था, जो और कहीं नहीं मिल सकता है। किसान का लड़का जिसका उम्र जवानी की दहलीज पर होता और विरहा गाता हुआ बैलों के पीछे-पीछे घूमते रहता था और बैल भी बड़ी गंभीरता से उसकी विरह गाथा सुनते हुए अपने काम में तल्लीन रहते थे। इन सबके बीच में कुएँ में गिरने वाले पानी का झर-झर और रेहट की कल-कल की ध्वनि का मधुर संगीत होता था। इन सब को शायद शब्दों में बांध पाना संभव नहीं है। इसे तो बस अपने स्मृतियों में ही जिया जा सकता है।
मृत्युंजय पाठक
(पनेरीबाँध, मेदिनीनगर)
Image may contain: outdoor and nature
You, Anand Keshaw, Prabhat Mishra and 61 others
3 comments
5 shares
Love
Love
Comment
Share

No comments:

Post a Comment