#ठेठ_पलामू: पुटुस
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#पुटुस के नाम से प्रसिद्ध रंग-बिरंगे फूलों वाला यह कंटीला झाड़ दिखने में जितना मनमोहक लगता है, उतना ही औषधीय गुण अपने अंदर समेटे हुए है। इसकी टहनियाँ, पत्ते, फल-फूल सभी औषधीय रूप में प्रयोग किए जाते रहे हैं। दाँत और मुँह संबंधी कुछ समस्याओं में यह बहुत ही कारगर साबित होता है। स्थानीय लोग इसकी टहनियों को दातुन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसकी बड़ी झाड़ियों से सीधी व लंबी छड़ीनुमा लकड़ियाँ निकलती हैं, जिससे टाटी और घोरान का निर्माण किया जाता है।
कहते हैं कि इसकी सूखी पत्तियों को जलाने से मच्छर भाग जाते हैं। इसके फलों का तो, क्या कहना बचपन में कच्चे हरे फलों को पुटुर पुटुर चबाने में अलग ही आनंद मिलता था। खैर की लकड़ी या सेमर की छाल के साथ खाने से मुँह एकदम लाल हो जाता था, पान से भी ज्यादा और इसके पके हुए मीठे फल तो गौरयों का पसंदीदा भोजन हुआ करता था। छोटी चिड़िया पुटुस से आकर्षित होती है, साथ ही यह मल द्वारा इनके बीजों को अन्यत्र पहुँचाती है, जो कि इस पौधे की प्रजाति आगे बढ़ाने में सहायक होती है।
पुटुस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कहीं भी फल-फूल जाती है, नदी-तालाब का किनारा हो या टांड़-टीकर कहीं भी, किसी भी स्थिति में रह लेती है। कुछ जगहों पर पुटुस को 'सत्यानाशी' भी कहते हैं, इसका कारण यह है कि यह तेजी से बढ़कर झाड़ का रूप ले लेती है और मिट्टी की उर्वरता को भी सोख लेती है, तभी तो आवासों और खेत-खलिहानों से लोग इससे दूरी ही बनाते हैं। पर बच्चे कहाँ मानने वाले थे। हमारा तो बचपन ही इन्हीं झाड़ियों केे इर्द-गिर्द गुजरा है। आज ये झाड़ यदा-कदा कहीं दिख जाए, तो चेहरे पर अनायास ही इनके फूलों को देखकर मुस्कान खिल जाती है। शहरीकरण के इस दौर में अब तो हम इसे भूल ही गए हैं।
© Sandhya shekhar
(संध्या शेखर समाजसेवा का काम करती हैं और लॉ की स्टूडेंट भी हैं)

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