"अरे! ये तो अपना पलामू किला है, बेतला का जंगल है..."अगर ये शब्द आपकी जुबान पर आ जाए तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप यहां पहली बार जा रहे हैं। कई बार या यूं कहें बार-बार जाने वाले के ये उद्गार हों तो उसकी निगाहें कुछ खास तो देख ही रही होंगी। वह कुछ अलग अनुभव तो कर ही रहा होगा। बड़े भाई हैं मेरे, मुंबई में रहते हैं और फिल्म, साहित्य और राजनीति पर खासी मजबूत पकड़ रखते हैं। उन्होंने मुझे एक बांग्ला फिल्म देखने को कहा। इस हिदायत के साथ कि भले ही बांग्ला समझ में न आए पर देखना जरूर। फिल्म देखी, भाषा कम पर भाव मन-मस्तिष्क पर छाते चले गए और अनायास ही भावनाएं शब्दों में फूट पड़ीं।
बात कर रहा हूं बांग्ला फिल्म '#पद्म_गोलाप' की। इस फिल्म के आउटडोर हिस्से की अधिकांश शूटिंग बेतला और पलामू किला में हुई है। फिल्म की नायिका हैं #अपर्णा_सेन और डबल रोल है इनका यानी सरला व रीता की भूमिका। हीरो हैं #सौमित्र_चटर्जी (तापस राय) जबकि विलेन अजीतेश बनर्जी (रमाकांत) बने हैं। फिल्म की शुरुआत में रांची जाने की बात कही गई फिर जिक्र आता है #बरवाडीह का। ट्रेन का दृश्य है और डायलॉग है, 'बरवाडी आस्चे, आमेदार नामते होबे (बरवाडीह आ रहा है, हमे उतारना होगा)।' लेकिन अभी जो बात शुरू में मेरी जुबान पर आई थी वह अपर्णा सेन की आवाज सुनकर निकली थी। अपर्णा जीप चलाते हुए जा रही हैं और साथ में हैं सौमित्र चटर्जी। अचानक वह जीप रोकती हैं और कहती हैं, 'ऐटा देखछेन...ओनोन्तो रायेर किला...ऐईखाने भूत आछे...(ये देखो, अनंत राय का किला...यहां भूत रहता है)।'
इसके बाद दोनों किले के भीतर जाते हैं और गाना गाते हैं, 'आमी आछी ...तौबो नेयी...जे टुकु आछे मोर...से तो शेष जैनो शुरू तेई...।' यानी 'मैं हूं...फिर भी नहीं हं...जो कुछ भी मेरा है..,वो तो जैसे शुरू में ही शेष है।' इसी लोकेशन पर एक गाना और है। कलाइमेक्स भी यहीं फिल्माया गया है। पूरी फिल्म के कई सीन दोनों किलों के ही हैं। नया किला के ऊपर से ओरंगा नदी को देखते ही आंखों को सुकून मिलता है।
#केचकी जाने वाले ट्रेन लाइन को देखना, वहां की गुमटी (बैरिकेड) को देखना है एक अजब सा रोमांच पैदा करता है। केचकी में जिस जगह पर पिकनिक मनाया जाता है वहां पर बड़ा ही रोमांटिक सीन है। अपर्णा सेन सौमित्र चटर्जी से गाने के लिए कहती है। हीरो पहले आनाकानी करता है फिर ताली बजाते हुए भजन गाता है, 'गुरुदेवो दोया कोरो....दीनो जोनें...', इस पर हीरोइन हंसते लगती है और गाती है, 'भालो लागे...काछे थाकले... आरो भालो लागे...आरो किछू डाकले...काछे थाकले... भालो लागे...( अच्छा लगता है...साथ में रहने से...और भी अच्छा लगता...कोई जब पुकारे ... पास में रहने से.... अच्छा लगता है)।' एक जगह केर में वन विभाग का पुराना वाला बंगला भी दिखाया है। इसमें अभी थाना है। इस फिल्म की शूटिंग 1968 में हुई थी। बंगालियों के लिए पलामू स्विटजरलैंड से कम नहीं रहा है। वे यहां घूमते तो थे ही साथ में वहां के फिल्मकार यहां की हसीन वादियों को रूपहले पर्दे पर भी लाकर उन बंगालियों को भी यहां के अप्रतिम सौंदर्य की झलक दिखा देते थे जो यहां नहीं आ पाते थे।
अब थोड़ी चर्चा फिल्म की। इसमें रहस्य भी है और रोमांच भी। रमाकांत अपनी पत्नी को मार देता है। दिखावे को तो वह बिजनैस मैन है पर धंधा चरस, कोकीन बेचने का करता है। अपनी भाभी के नाम पर पलामू फोर्ट (पुराना किला) खरीदता है। अपनी भतीजी को बेटी बोलता है। तापस राय की इंट्री फिल्म में बेरोजगार युवक के रूप में होती है। सरला उसे काम दिलाती है। दूसरी बहन रीता उसकी मदद करती है। रमाकांत दोनों के पिता को ब्लैकमेल करना चाहता है। एक जगह सरला के पिता का डायलॉग है, 'तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो...कितना पैसा चाहिए...दस हजार...बीस हजार...एक लाख।' कहानी आगे बढ़ती है, तापस का काम रमाकांत की कारगुजारियों को उजागर करना है। जब रमाकांत की सच्चाई सामने आ जाती है और वह पुलिस से घिर जाता है तो तापस राय वहां आता है और अपनी मुंछ हटाते हुए बोलता है, 'तापोस राय...स्पेशल सुपरिटेंडेंट...स्पेशल ब्रांच।'
बेतला में एक झील है 'कमलदह'। इसकी गहराई और खूबसूरती अतुलनीय है। फिल्म के नाम से कमल की अनुभूति होती है। पद्म का अर्थ होता है कमल और गोलाप बोलते हैं गुलाब को। अपर्णा सेन का डबल रोल है इस लिए दो फूलों के नाम पर फिल्म है। इस फिल्म की शूटिंग में पलामू के व्यवसायी #मोहन_विश्वास का सबसे बड़ा हाथ था। फिल्म के डायरेक्टर अजीत लाहिड़ी ने इसके लिए उनका आभार जताया है। जैसा कि मैंने शुरू में लिखा है कि यह फिल्म मैंने अपने भैया के कहने पर देखी है तो अब ये बताना जरूरी है कि वे कौन हैं। #रविशंकर _पांडेय नाम है उनका। अभी मुंबई में रहते हैं। वे इस फिल्म की शूटिंग के साक्षी हैं। उन्हीं के शब्दों में, 'अपर्णा सेन हों या सौमित्र चटर्जी या अन्य कलाकार, इनके लिए बेतला के जंगलों का नैसर्गिक सौदर्य और पलामू किले की भव्यता दीवाना बनाने वाली थी।' इन जगहों पर शूटिंग कर चुके पलामू के रंगकर्मी सैकत चटर्जी के लिए यह फिल्म देखना रोमांचित करने वाला था। उन्होंने भी एक शार्ट फिल्म ' बचाओ' की शूटिंग यहीं की है और क्लाइमेक्स भी पलामू किला का ही है। मेरे अभिन्न मित्र गोरा दा (दिव्येंदु गुप्ता) कहते हैं, '50 साल पहले वाली स्थिति फिर से वापस आनी चाहिए। आज भी प्राकृतिक सौंदर्य वही है, किला वही है, ओरंगा और कोयल की कलकल धारा में वही चंचलता है पर कोई इस खूबसूरती को कैमरे में कैद करने क्यों नहीं आता।' अब ये बड़ा सवाल तो है ही। 1969 में सत्यजीत राय यहां 'अरण्येर दिनरात्रि' की शूटिंग करते हैं। इससे एक साल पहले 'पद्म गोलाप' की शूटिंग हुई। इससे पहले भी एक और बांग्ला फिल्म की शूटिंग हुई है। उसकी चर्चा फिर कभी।
एक अपील जरूर है, कोई तो आगे आए! खासकर सरकार। उम्मीद है और इसी पर तो दुनिया टिकी है।
© Prabhat Mishra' Suman'
लेखक अमर उजाला, नोएडा से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं और पलामू निवासी हैं।

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