बात आजकल की ही है जी हाँ जाड़े के दिनों की.
ईन दिनों अक्सर बाजार मे नए आलू और पुराने आलू के बीच श्रेष्टता का जंग छिड़ा होता है. और इस जंग के बीच में क़ीमत आता है, और फैसला हो जाता है. जी हाँ! जो आलू सस्ता है वही अच्छा भी है। खैर नया हो या पुराना आलू तो आलू है।
आलू की बात इसलिए क्योंकि जाड़े के दिन मे अक़्सर ही आलू पराठा बनाया जाता है। जाड़े के दिनों में जब खाना बनाने में ठंड लगे तो मिट्टी का चूल्हा याद आता है और फिर कहीं से लकड़ी का जुगाड़ तो हो ही जाता है। रोटी के साथ साथ हाथ पैर सेंकने के लालच मे मॉडर्न महिलाये (गैस , इंडक्शन प्रेमी) भी मिट्टी के चूल्हे की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं।
अब सिलसिला शुरू होता है आलू पराठा बनने का। मिट्टी के चूल्हे पर बने पराठे और #टमाटर की खट्टी-मीठी चटनी का तुलना अगर गैस, और इंडक्शन पे बनाये गये पकवानों से करे तो ये कलयुग का घोर पाप होगा। आलू पराठा के साथ अगर #लहसून और #धनिया की चटनी मिल जाए तो फिर क्या बात है।
मतलब स्वाद ही अलग होता है। चूल्हे मे जलती आग को देख कर हाथ सेंकने के बहाने ही घर के बच्चे भी काम मे हाथ बटाने लगते हैं। चूल्हे से कुछ दूर पे अपनी #अंगिठी के साथ बैठी दादी भी अपनी कहानिया सुनाती रहती है और इस तरह हसते हुए गप करते हुए पराठा तैयार हो जाता है। और जब #गरमा_गरम रोटी थाली में मिलती है तो खुद को रोक पाना मुश्किल हो जाता है। फिर क्या रोटी के साथ साथ हाथ मुह पेट सब गर्म, खैर इसका ही तो स्वाद है। #दुअछिआ चूल्हा हो तो साथ में आलू गोभी की #रसदार (झोर) तरकारी बनने मे भी देर नहीं लगता है। और पानी भी तो गर्म करना होता है पीने के लिए, पलामू के ठंड मे ठंडा पानी पीता कौन है।
तो जाइए और मिट्टी के चूल्हा में आलू भरल रोटी बनाइए और आनंद लीजिए। और हाँ मिट्टी का चूल्हा ना हो तो पहले चूल्हा बनवाइए।
ललचाने के लिए फोटो भी एड कर दिए हैं।
© बालेन्दु शेखर

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