वो थी ही बड़ी प्यारी। श्यामवर्णा, छरहरी, नशीली आंखे, काली घनीे कमर तक नागिन की तरह बल खाती उसकी चोटी, ऊंचे कद-काठी की स्वामिनी जब सड़क से भी गुज़रती तो लगता ट्रेंड मॉडल अपने शारीरिक सौष्ठव का प्रदर्शन कर दर्शकों को मोह रही है। उम्र तो थी पंद्रह की पर दिखती सत्रह की थी। कहीं से भी नहीं लगता था कि उसका संबंध किसी निर्धन परिवार से है। रूप का खजाना दोनों हाथों से ऊपरवाले ने लूटा दिया था कमली पर। कोई ऐसा रंग न होगा जो उसपे ना फबे।
पितृविहीन नवयौवना पिछले तीन बरसों से शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी के घर घरेलु सहायिका के रूप में काम कर रही थी और माँ महरी का काम मुहल्ले के चार घरों में करती थी। मालिक की बेटी के साथ रहने के लिये उसे रखा गया था। मालिक की हमउम्र बेटी के साथ खेलती खाती कमली को शायद उसी घर के पोष्टिक आहार ने और लावण्यपूर्ण बना दिया था। कमली अब माँ के लिए चिंता का विषय थी। एक ही चिंता थी कमली की माँ को बस जल्दी से उसकी शादी हो जाये। जिस बस्ती में माँ रहती थी वहां जाने पर बेटी सुरक्षित न लगती कमली की माँ को, क्योंकि बस्ती के मनचले शोहदे फब्तियां कसते, सीटिया बजती और कुछ दुःसाहसी रास्ता भी रोक चुके थे। भद्दी गालियां देती सुभागी उन शोहदों को खदेड़ देती। अक्सर उसे देख मैं सोचती थी ये शिवानी की नायिका ही है। पर क्या पता था कि इस रूपसी नायिका का कड़वा, घिनोना सच झकझोरने को मजबूर कर देगा।
शाम को चाय का प्याला लिये बालकॉनी में बैठी, फुहारों का आनंद ले रही थी। बादल झुके जा रहे थे कि अचानक सुभागी आ मेरे पैरों के पास बैठ गई। आंखों की बरसात ने मुझे आशंकित कर दिया। बड़ी बड़ी बिपदा में भी ऐसे तो कभी नहीं रोई सुभागी। चुप कराने के सारे प्रयास विफल। थोड़ी देर शून्य बानी बैठी रही वो, मैं उसकी पीठ पर हाथ फेरती रही। चीरा लगाकर भी कई बार मवाद बाहर नहीं हो पाता, तो कभी सुई की नोंक चुभते ही घाव बह जाता है।
अचानक वो बोली 'मैडमजी'
'बोल सुभागी, कहो ना क्या बात है?' मैंने पूछा।
भर्राई आवाज में बोली-
"वो कमली...कमली हुई न, ओकर मालिक इन्सान नहीं मैडम हैवान हई हैवान। बेटी बोलत रहे हमर कमली के आउ काम कर लख एतने नीच। हम तो दु महीना बाद बड़ बेटी घर से आईली। अब हम्मर बेटी बदचलन हो गइल। हम पुछली आपन कमली से, केकर हउ तोहार कोख़ में,सच बताव। कमली जे बतईलख सुन के त् हमार करेजा पर बिजुरी गिर
गइल मैडमजी। अब हम का करू? कमली के मलकिनी कहत बा पइसा ले ला हमरा से अउर सफाई करा ले। उपरे से भी पइसा देवे के बोललन, कहलन बेटी के बियाह कर दो हम मदद करेंगे। विलाप करती सुभागी का आर्तनाद सीना चीर रहा था मेरा। कुछो समझे नहीं आ रहल बा दीदी, कहाँ जाऊ, कोने कुइया में कूद जाऊ। "सकते में बैठी मैं सुभागी के आर्तनाद से विचलित हो गई। खुद पर काबू कर कुछ देर बाद मैंने पूछा, थाना चलेगी...? लड़ने की हिम्मत है?पहले डॉक्टर से मिलना होगा?इस अपराध से बचेगा नहीं तेरी कमली का मालिक। बोल, मैं तेरा साथ दूंगी। कानून सख्त है अब। वो बोली -"दीदी, तब हमार कमली के बियाह कइसे होइ। के करतई हमर कमली से बियाह। छोट जात, उपरे से गरीब उहनी कुचेल दिहे हमनी के। हमर कमली के सुंदरता मे ग्रहन लग गइल।
आगे कमली की माँ ने जो बताया सुन मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। सारी नारीवादी, सशक्तिकरण का उसी क्षण बलात्कार हो गया क्योंकि कमली की मालकिन "घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न की ख़िलाफ़त करनेवाली चर्चित समाजसेवी हैं। अपने क्रिया कलापों से स्वनामधन्य होने की उनकी कोशिश कई बार अखबारों में दिखाई देती है।
सुभागी को समझाने की जब सारी कोशिशें नाकाम रही तो मैंने उसे चाय पिलाई और यथासंभव आर्थिक सहयोग दिया। स्वाभिमानी सुभागी ने जाते जाते कहा-" मैडमजी , हमर आत्मा ख़ूने खून हो गइल बा। एक बात कहूं दीदी--भगवान केकरो के बेटी न देवे, अगर देवे त् ख़बसूरती न देवे। गरीब के बेटी के नाम सुभागी न होवे के चाही।
सुनकर दिल तार तार हों गया, आंखे भर आईं। कितनी खोखली तरक़्क़ी की बातों में जी रहे हैं हम। कुछ दिनों बाद हम देश की आज़ादी का उत्सव मनाएंगे तब तक शायद कमली को भी अनचाहे गर्भ से मुक्ति मिल जाएगी!!

No comments:
Post a Comment