Friday, March 3, 2023

" बासी रोटी "

भोरे-भोर भूख अपने प्रचण्ड प्रहार से मुझे पराजित करने के लिए प्रयासरत था, रसोई की तलाशी ली जा चुकी थी, फ्रिज का कई बार औचक निरीक्षण कर लिया गया था। डिब्बे में कैद निरीह बिस्कुट की ताबड़तोड़ निर्मम हत्या का सिलसिला चालू हो चुका था। जब आप घर में अकेले हों तो आलस्य भी अपने चरम पर होता है। रात कुछ भी खा कर सोने के वक़्त सुबह के इंतजाम का कहाँ आभास रहता है. सुबह देर तलक स्वप्न लोक से विचरण करने के पश्चात वास्तविकता के धरातल पर पटके जाते हैं, तो पता चलता है कि सुबह ऑफिस के लिए बहुत विलंब हो रहा है। तब स्मृति पहुंच जाती है बचपन के उस मनमोहक दृश्य पर, जब हम बच्चे भोरे भोरे मुँह धोते ही बासी रोटी पर टूट पड़ते थे। एक गिलास चाय में रोटी को रोल बना कर डुबो-डुबो कर खाते थे।
आह! क्या मनोरम युग था वो, जबकि दादी रात को बच्चों की संख्या के हिसाब से गिनती कर के, फिर थोड़ा ज्यादा ही रोटियाँ रात में ही बना देती थी। उन्हें पता होता था कि सुबह चूल्हा जोराने से पहले गृहणी को धार्मिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कुछ भी ताजा खाद्य सामग्री उपलब्ध होने में कम से कम 8:30 बज जाएंगे। मगर छोटे पेट वाले बच्चे कितना भी पेट भर के खाएं, रात की लंबाई में खाना पेट से छु मन्तर हो ही जाता। फिर सुबह सुबह पेट मे चूहे नहीं, साक्षात बिल्ली ही रेस लगाने लगती। उस ज़माने के बच्चों को बिस्कुट मिक्सचर से ज्यादा लगाव नहीं था। चाऊमिन, पास्ता तब तो हमारे शब्दकोश में भी नहीं था। भूखे आत्मा को संतुष्टि सिर्फ भात रोटी से ही प्राप्त होती थी। हालांकि संतुष्टि की परिभाषा आज भी वही है मेरे जैसे कई पलामू वासियों के लिये।
इन्हीं सब विकट भूखण्ड में प्रचंड भूख को खंडित करने के लिए दादी-नानी ने बासी रोटी नामक व्यंजन का आविष्कार किया था। अब आदत ऐसी लगी कि गर्म रोटी के लिए मार करते शहरी मित्रों को देख दया आती है, भला उन्होंने बासी रोटी के अद्भुत स्वाद को जाना ही कहाँ हैं अब तक। बासी रोटी वो जो रात भर की शीतलता को खुद मे समाहित किए हो तभी तो शक्ति प्राप्त थी उसे जठराग्नि को बुझाने की। बासी रोटी वो, जिसे बनाते वक़्त ही माँ दादी देख चुकी होती थी, उसे खाने वाले चेहरे और उसकी उषा काल की भूख की व्याकुलता और सेवन के बाद की संतुष्टि को। बासी रोटी वो जिसकी कोई फूटानी नहीं, चाहे तो चीनी पानी के साथ भी, नमक लगा के रोल बना के भी, टमाटर की चटनी के साथ भी या फिर अपनी व्युत्पत्ति के सहचर बासी सब्जी और उसके साथ मौजूद प्रचुर रस के साथ भी... सब जगह उतना ही स्वादिष्ट।
बासी रोटी की खोज में हमारा मन व्याकुल हो रहा था। फ्रिज ओवेन धोखा दे चुके थे। ठेठ पलामू पर किसी खाद्य सामग्री का नया पोस्ट भी आ गया था, मेरे कष्ट की आग को रफ्तार देने के लिए। तभी हमने अपने श्रीमती जी को संदेश भेजा कि अब से रोज रात में हमारे लिए बासी रोटी का प्रबंध किया जाए।
ताजे सुबह में बासी रोटी हमे हमारे सुनहरे बचपन की सैर कराती रहे और भोरे-भोरे हम ठेठ पलामू के पोस्ट को चाव से पढ़ते रहें।
आर्टिकल और तस्वीर: सत्यान्वेषी स्वामी
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Thursday, March 2, 2023

लालटेन

 बिजली के तार में लटके इस लालटेन को देख रहे हैं आप। साहब! यह कोई काल्पनिक व्यंग नहीं, पलामू की विद्युतीय सच्चाई है।

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Wednesday, March 1, 2023

" माथा में रंगबाज़ कपरफुटा हो गया है "

 कभी किसी प्रवासी पलमुवा(अर्थात साल में एकाध हफ्ता के लिए पधारने वाले) के साथ बस 15 मिनट बिताइए। आपको पलामू को देखने का एकदम नया नज़रिया मिल जाएगा। हमारे प्रवासी भाई जी का पिछले हफ्ते आगमन हुआ और तब से मेरा अधिकतर समय उनके नॉस्टैल्जिक वाले पागलपन की संतुष्टि में ही पार हो रहा है। किसी भी झाड़-झंखाड़ को अद्भुत प्रकृति का उपहार बताने और यहाँ की मिट्टी को चवनप्राश का दर्जा सुन कर कान पक चुका था।

ये सब जैसे कम नहीं था कि भ्राताश्री की नज़र रास्ते में 'रंगबाज़ कपरफुटा का इलाज' वाले बोर्ड पर पड़ी। अब लग गए इस अजीबो-गरीब सी बीमारी औेर उसका इलाज करने वाले तथाकथित डागडर साहेब की खुफिया तफ्तीश में। छोटा-भाई होने के कारण मुझे ही नकली मरीज़ बनने का सम्मान मिला और प्रवासी भाई साहब पूरी तन्मयता से पूरे वार्तालाप का आनंद लेने में मशगूल थे।
अब आपलोग डागडर साहेब और हमारी वार्तालाप पे एक नज़र डालिये-
"डॉक्टर साहब दिमाग सनसना रहा है, एकबैगे उड़े लगता है, बहुत बथता है।"
- रंगबाजे हईये है, उहे बुझा रहा है"
"चश्मा बनवाये तबो बेस नहीं बुझा रहा है।"
- दवाई बनाना होगा, अइसे नहीं ठीक होगा...
फिर माथा छू के बोला कि
- गाढ़ा(गढ्ढा) हो गइल है माथा में.. पहिले रेंगन के होता था, अब बड़हन में भी होए लगा है..
दवाई बना दे रहे हैं, एक हज़ार लगेगा।
"पैसा नहीं है ओतना जी।"
- पांचो सौ के बना देंगे।
"ओतनो पइसा नइ है जी।"
- अच्छा बाद में बनवा लीजियेगा दवाई, 20 के तेल ले लीजिए ना, तब तक बढ़े नहीं देवेगा.. दिमाग मे कीड़ा होता है.. खात-खात गाढ़ा कर देता है। कुछ नहीं कीजियेगा त फेरा में पड़ जाइयेगा।
लौटते समय भ्राता श्री के चेहरे को देख कर मुझे अंदाज़ा लग रहा था कि नोस्टाल्जिया का भूत कुछ हद्द तक उतर चुका है। इस तरीके की धोखाधड़ी और स्वास्थ्य के नाम पर मूर्ख बना कर लूटने के प्रयास के बाद भाई जी लौटते समय इतना ही बोले " सब तरह का लोग हर जगह होता है। कमाने खाने में बुराई नहीं। लेकिन रंगबाज कपरफुटा के चक्कर में ये लोग सच में जिस मानसिक रोगी को मदद की जरूरत होगी, उस केस को भी खराब कर देता है।"
खैर! ये रंगबाज कपरफूटा नाम की हैरतअंगेज बीमारी जो कि सिर्फ पलामू में पायी जाती है, उसके बारे में गूगल भी कुछ नहीं बोल पायेगा। आप सबों से निवेदन है कि जब भी सरदर्द या कोई मानसिक बीमारी हो, तो ऐसे नीम-हकीम-खतरे-जान के चक्कर में ना पड़ें। कोई ढंग के डॉक्टर से इलाज करवाएं।
आर्टिकल एवं तस्वीर: Sunny Shukla Rohan
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Tuesday, February 28, 2023

" डेढ़-गोड़िया साईकिल "

डेढ़-गोड़िया जो हमलोग अपने भाषा मे बोलते हैं साइकिल सीखने का दूसरा स्टेज है। कोई-कोई इसको "कैची" भी बोलता है। डेढ़-गोड़िया इसलिए क्योंकि इसमें एक पैर इधर और दूसरा आधा पैर डंडी के बीच मे होता है।
हमलोग के गाँव मे उस समय मोटर साइकिल का चलन नहीं आया था। किसी-किसी के घर मे ही राजदूत या हीरो-हौंडा दिखता था, लेकिन साइकिल लगभग हर घर में यातायात का प्रमुख साधन हुआ करता था। अब तो जबसे ये फाइनेंस का सिस्टम आया है, सब लोग मोटर-साइकिल और कार खरीद रहे हैं और साइकिल बेचारा उपेछित विलुप्ति के कगार पे आ गया है।
अभी की तरह उस समय बहुत प्रकार के साइकिल नहीं हुआ करते थे, जैसे छोटा साइकिल, तीन पहिया वाला बच्चों का साइकिल और अगर होता भी होगा तो गाँव मे देखने को नहीं मिलता था। गाँव मे बुढ़वा साइकिल 24 इंच वाला ही हर घर मे पाया जाता था। रेंजर-वेंजर ले के कोई लइका ट्यूशन मे आ जाता, तो वो आकर्षण का केंद्र बन जाता था।
उस दौर मे साइकिल का सुरक्षा का ख्याल भी काम नहीं रखा जाता था। नार्मल ताला के साथ पाइप वाला ताला अलग से लगाया जाता था। उसका नाम तो नहीं पता, लेकिन स्पोक के बिच मे घुसा के पूट से लॉक हो जाता था। अगर किसी को उसका नाम पता हो तो कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा।
अभी के लइकन मे जितना ललक मोटर साइकिल सिखने का है, उससे ज्यादा ललक हमलोग को साइकिल सीखने का हुआ करता था। उस समय साइकिल का चाभी प्राप्त कर लेना कोई मिशन से कम नहीं होता था। चलाने भले ना आता हो, लेकिन साइकिल को डुगरा के ले जाने मे ही हमलोग परम आनंद की प्राप्ति कर लेते थे। फिर सिखने का प्रयास का प्रारम्भ होता था, एक गोड़ डंडी के अंदर डाल के पैण्डल पे रखते थे, फिर दूसरा पैर से धकेलते हुए पैण्डल को ऊपर नीचे करते थे। फिर कोशिश करते थे कि दूसरा गोड़ जिससे धक्का दे रहे थे, उसको भी दूसरा पैण्डल पे रख ले। यकीन मानिये नील आर्म स्ट्रांग को चाँद पे पैर रखते हुए इतना खुशी नहीं हुआ होगा, जितना खुशी हमको तब हुआ था, जब दोनों पैर हम पैण्डल पे रख लिये थे। दोनों गोड़ पैण्डल पे रखने के क्रम मे जब गिरते थे, तो सीधे ठेहुना फुटता था। अगर साइकिल सिखने मे आपका ठेहुना ना फूटा तो आप क्या ही साइकिल सीखे।
साइकिल सिखने के बाद भी एक समस्या है अपने घर वालो को यकीन दिलाना की आप सीख चुके हैं। फिर ये साबित करने के लिए आपको जबरदस्ती चला के दिखाना पड़ता है। इस दौर को पार करने के बाद आप घर के लिए आटा पिसवाना, दवाई लाना, कंपाउंडर बुला के लाने जैसा काम के लिए उपयोगी हो जाते हैं। सीट पे बैठ के चलना भी JPSC उत्तीर्ण करने जैसा कठिन होता है जो अगला भाग में मजेदार तरीके से प्रस्तुत करेंगे।
आपके रंग मे रंगते हुए....
✍️ Gyan Singh
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Monday, February 27, 2023

घर का चिप्स, पापड़, अचार

 पलामू में त जाड़ गया नहीं कि गर्मी बरसे लगता है। बसंत फसन्त के कल्चरे नहीं रखे हैं हम लोग आपन यहां। साल-शूटर उतरा नहीं कि डाइरेक्टे पंखा कूलर चालू।

जाड़ के मौसम जइते घाम बोले तो रऊदा बड़ी तेज होये लगता है। आऊ एकरे फायदा उठाके घर की माताएं लगे हांथ चिप्स, पापड़ आऊ सुखौटा बनावे में लग जाती है। वइसे तो सबसे बढ़िया लगता है आलू के चिप्स(उपरे से चाट मसाला छिड़क के बड़हन डूभा से भर के कबो सकार सकते हैं), पर अब नयका दौर में केला, शकरकंद, सूजी, साबुदाना आउ चावल के पापड़ और चिप्स भी बनने लगा है। बहुत से घरों में होली के पहले से ही महिलाएं लग जाती हैं चिप्स, पापड़ बनाने में या फिर होली खतम होत बड़का-बड़का आलू आ जाता है और फिर पसेरी के पसेरी आलू किनाये लगता है।
हालांकि संयुक्त परिवार की समाप्ति और ऑनलाइन मार्केटिंग और नयी महिलाओं की आलसीपन ने इस परंपरा को खासा प्रभावित किया है। अब महिला के वश की बात नहीं कि दैनिक कार्य निबटाकर वो चिप्स, पापड़ भी बना ले। और जब ऑनलाइन घर तक ये प्रोडक्ट आ ही जाते हैं तो कोई भला मेहनत क्यों करना चाहे! पर हमारी पीढी ऐसी पीढ़ी रही जिसने चिठ्ठी भी देखी, लैंडलाइन फोन देखा, स्मार्टफोन देखा, घर में अचार, पापड़, चिप्स और मसाले बनते देखा। हमने लेदरा का सुख भी अनुभव किया, तोसक पर भी सोए और कर्ल ऑन गद्दे भी देखे। हमारी पीढ़ी के बच्चे अपनी मांओं के साथ गर्मी की शुरुआत में अहले सुबह उठकर चिप्स, पापड़, अचार बनाने में उनका हाथ बंटाते थे, उसके बाद स्कूल जाते थे।
घाम होने से पहले ही बाध वाला खटिया घामा में लग जाता, ओकरा पे सूती वाला पातर साड़ी चाहे ओढ़नी बिछा के ओकरे पर चिप्स पसारल जाता था। सबसे मशक्कत था आलू छिलके पानी में डालना आऊ फिर पतला-पतला सांचे में काटना। जितना पतला चिप्स कटता उतना ही बजरूआ दिखता, एकदम कागज जैसा, भकभक उजर! चिप्स काटने के बाद भी चैन नहीं था फिर ओकरा खौलत पानी में डालके तुरंत निकाल के सूप में छानना पड़ता था ताकि पानी गर जाए। नमक, फिटकरी आऊ लालमिर्च वाला इ पानी चिप्स के स्वाद और सुंदरता बढ़ा देता था। फिर पानी निथार के एकरा घामा में खटिया पर डालना होता और पलटना भी पड़ता ताकि दूनो बगल सूख जाए। बढ़िया घाम रहला पर दू तीन दिन में सुखा के एकरा हवा बंद डिब्बा में रखना होता आऊ खिचड़ी के साथे, चाहे पहुना अइला पर चाय के साथे एकरा परोसल जाता था।
कभी सब्जी एके गो रहे तो दालभात पर भी चिप्स छान के खाना के स्वाद बढ़ा देवल जाता था। ससुराल में रहे वलन बेटी को भी माताएं ये सब भेजा करती थीं! एतना पर भी घर के लेडीज लोग कहां मानती थी, फिर आलू, साबुदाना, सूजी, तिल, मसूर, उड़द, चावल के पापड़ भी बनता। ओकरो में पूरा मेहनत था । साबुदाना के गलाके ओकरा चिकन प्लास्टिक पर चम्मच से डालना होता था, फिर दोनों बगल पलट के सुखाया जाता, तब डिब्बे में रखल जाता था। साबुदाना वाला पपड़वा के एगो खास बात था कि गर्म तेल में जइते इ अपन साइज से एकदमे दुगुना-चौगुना बड़ा हो जाता है। थोड़ा बड़ा तो आलू के चिप्स आउ तिलौरी, चरौरी भी होता लेकिन इ त एकदमे आपन आकार बदल देता है, बड़ी बढ़िया लगता था इ सब देख के!
बाजार से चाहे ऑनलाइन मार्केट से केतनो मंगाकर चिप्स, पापड़, अचार खा लें पर घर के बने चिप्स, अचार, पापड़, अदौड़ी की तो बात ही निराली है । इ जो आजकल के बचवन Lays-कुरकुरे के नाम से अगज-बगज मसाला लपेटल चिप्स खाता है न, एकरा से स्वाद में तनको कम नहीं था हमर जमाना के आलू चिप्स। हमनी एकबार में एक एक प्लेट चिप्स अइसहीं खा जाते, आजकल के बचवन जइसन नहीं कि दस, बीस रूपया में आधा हवा भरल चिप्स के पैकेट में ही संतोष करेला पड़े।
बेशक आज की माताएं ज्यादातर कामकाजी हैं, पर जरा भी समय मिले तो एक दो किलो आलू का ही सही, थोड़े से चावल का ही सही घर का चिप्स, पापड़, अचार बनाकर पुरानी परंपरा और अपने हाथों के प्यार को अवश्य जिंदा रखें। चिप्स, पापड़, अचार, सुखौटा, अदौड़ी को लेकर अपनी पुरानी यादें अवश्य शेयर करें।
आर्टिकल एवं तस्वीर: शर्मिला शुमी
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Friday, February 24, 2023

अर्रे आवअ बर्रे आवअ

अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
बाबू के मुंह में घूं ... ट!
एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे.
चंदा मामा दूर के
पुआ पकावे गुड़ के
अपने खाए थाली में
मुन्ना के देवे प्याली में
प्याली गया फूट
मुन्ना गया रूस!
जब हमनी लैकइयाँ में रही, तब भी गरमी तो पड़ते रहे! मागिर से घरी के मज्जा कुछ आउ रहे। तब के मज्जा के बात मत पूछूं।
गरमी के दिन में अंगना में खटिया के लाइन लगाके जब हमनी आजी, माई, चाची, बहिनी और छोट भाई के साथे लेदरा बिछाके सुतती, और तखनिए छोटका बचवा आपन राग में रोएला शुरू करतक, तब माई और आजी में से कोई आपन गान कढ़ावे ला शुरू करते हलन...
"अर्रे आवअ बर्रे आवअ
नदिया किनारे आवअ
सोने के कटोरे में
दूध भात ले ले आवअ
ए बाबू के मुंह में घूंट!"
आउर बार बार गईला पर भी नन्हका चुप ना होए तो फिर से एगो आउर छोटे गो के गीत माई सुनावत रहे।
चंदा मामा वाला। एतना सुनते सुनते बाबू मइँयां कब सुत जइतन माइयो के ना पता चलतक।
उ शीतल मन्द मन्द हवा चलइत रहे कि बड़का बड़का आज के कूलर भी फेल रहे। आकाश पूरा साफ रहत रहे। आकाश में दूधिया प्रकाश के छटा आउर लाखों करोड़ों तेज चमचमात तरेंगन। आउर आकाश में एतना रौशनी कि हमनी के बड़ भाई तारा गिने में लगा देवत रहन। आउर हमहुँ इतने हशियार रही कि सच में गिने लगती। फिर का बा, एगो, दुगो, तिनगो, चारगो... चौदहगो, पन्द्रहगो...। तबले कौनो भाई बहिन चूंटी काट देतन! बस सब भुला जइती कि कोन तारा के गिनत रही आउर कोवन के नाही। फिर से शुरू करती। यही करते करते कखनी सुत जइती पतो ना चलतक।
ई रहे प्रकृति से सीधा सम्बाद और प्रदूषण रहित गाँव के खुशनुमा वातावरण। आउर संयुक्त परिवार के अपनापन और रिश्ता!
कल रात के फिर से मन कईलक कि खुला छत पर ही आज सुतल जाए। पर ई का? छत पर तो कोई हयीय नइखे! जब कि हमर परिवार में 18 गो आदमी बड़न। सभे आपन आपन कमरा में कूलर पंखा में बड़न। हम सोचली कि घर के छोटे छोटे लइकन के बोला के आपन बचपन के याद ताजा कर लेऊं आउ नाया नाया बचवन के भी प्रकृति से सम्वाद कराऊं। इहे सोंच के बेटा लड्डू गोपाल आउर भतीजी पीहू परी के छत पर बुलएली। फोल्डिंग बिछाके बचवन के खुला आकाश के तरफ देखेला कहली। लेकिन ई का? 'बर्रे' के तो अते-पते नाहीं! बड़ी ध्यान से देखली त बड़ी मुश्किल से गिने भर तारा देखइलक। आकाश प्रदूषण से भरल रहे, उमस भर रात। आज हम बिन तरेंगन के कइसे रेंगन के सूनाऊं- "अर्रे आवअ बर्रे आवअ..."
चनरमा पर नजर गेलक। चांद में ओतना चमक तो नाहिं रहे, आउ ना पहिले जइसन शीतलता, फिर भी
दुसरका गीतवा माई वाला सुनावेला शुरू कईली- "चंदा मामा दूर के, पुआ पकावे गुड़ के...।"
पर हमार बेटा-भतीजीन के ई कहाँ से मनभावन लगते हलक? उ सब तुरन्ते हमरा से पिंड छोड़ाके कार्टून-सीरियल टीभी में देखे नीचे चल गेलन। अब हम अकेले छत पर आपन बचपन के समय के पारिवारिक सम्बन्ध आउ प्रकृति में बदलाव पर सोचते सोचते नींद में घोलट गेली। पर अचानक ढेरे मच्छर काटे लगलन। तब फिर हमहुँ नीचे कूलर पंखा में आके आपन शरीर के कमरा में कैद कर लेली। पर मन में तो उहे 40 साल पहले के दृश्य चलईत रहे। सोचते सोचते रात के एक बज गइल रहे। फिर जल्दी जल्दी सूते के कोशिश कईली काहे कि सुबह में पौने छौ बजे स्कूल जाए ला रहेला न।
आर्टिकल: दिनेश कुमार शुक्ल
तस्वीर: सन्नी शुक्ला रोहन
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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Thursday, February 23, 2023

" नीम्बू की निमकी "

संभवतः शीर्षक पढ़ते हुए आपके मुंह में पानी जरूर आ गया होगा। मेरे हिसाब से नीम्बू की निमकी को अचारों का राजा कहा जाये, तो शायद ही किसी को आपत्ति हो। Old is Gold वाला कहावत भी पहले इसी के लिए बना होगा, काहे कि इ जितना पुराना हो, उतना ही बढ़िया माना जाता है।
आजकल के समय में विधा के अभाव में या फिर अन्य तरह के अचारों के बाजार में सुलभ होने के कारण, यह हाशिये पर गया हुआ मालूम पड़ता है (अगर आपके विचार इससे भिन्न हों तो मुझे ख़ुशी होगी), लेकिन एक समय था कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि किसी के घर में नीम्बू की निमकी न मिले। गाँव में लगभग हर घर में छप्पर/छत/ओटा/अंगना, कहीं न कहीं आपको नीम्बू की निमकी से भरा एक-दो बोइयाम(बोवाम/बोयाम/मर्तबान) जरूर दिख जाता था।
अच्छा, इसे बनाने में भी किसी तरह का कोई रॉकेट साइंस और महारत नहीं चाहिए। चाहे तो समूचे नीम्बू को या फिर जरूरत के अनुसार उसको काटकर बोइयाम में भरिये, नमक डालिए और रहने दीजिये धुप में कुछेक दिन, हो जायेगा कुछ दिनों में तैयार। बाकि मसाले वाले अचारों की तरह कोई विशेष खर्च नहीं, न ही इसके खराब होने का डर। वैसे बाकि सभी अचारों के बारे में एक बात होती थी कि फलना के हाथ का अचार बहुत बढ़िया सुतरता है, हम लगाते हैं, तो भुवा जाता है आदि-आदि। निमकी लगाने में कोई डर नहीं, निश्चिंत हो के लगाइए और परफेक्ट अचार पाइए।
वैसे तो नीम्बू का मसालेदार अचार भी बनाया जाता है लेकिन फिर उसे हम बाकि अचारों की श्रेणी में ही रखेंगे।और नीम्बू की निमकी को एकदम अलग। हमारे बचपन के समय का शाश्वत नास्ता, सूजी का हलवा का सहगामी के रूप में आप इसे जरूर याद करेंगे। सूजी के हलवा के साथ नीम्बू का अचार - बहुत ही स्वर्गिक संयोग होता था, इस खट्टे-मीठे स्वाद का। हमारे मनोनुकूल भोजन न बना हो घर में, तो वैसी स्थिति में मिन्नत कर इसे अपनी थाली में शामिल कराना और फिर चाव से खाना खतम करना लगभग एक नियम सा बना लिया था हमने।
और गुणकारी इतना कि पूछिए मत, पेट सम्बन्धी विकारों के लिए पुदीन-हरा से पहले इसी का बोलबाला था। किसी को अपच हो, धुवईन्धा ढकार आये, पेट खराब हो, सबके लिए नीम्बू का निमकी रामबाण होता था। कुछेक परिस्थितियों में तो इस अचार का पानी पीने (सादे पानी में घोलकर) की सलाह भी मिलती रही थी और ये तो एकदम आजमाया हुआ है कई बार।
एक बात गौर किये होंगे आप कि पुराना वाला नीम्बू के अचार को बीच से काटिए तो छिलके के अन्दर वाला हिस्सा पककर एकदम सुनहले रंग के शीशे की तरह का हो जाता था और मजे की बात तो यह कि लईकाई में हमलोग सोचते थे कि शायद शीशा इसी से बनता होगा और फिर कई तरह की कल्पना कि दुनिया में जितना शीशा है (मतलब हमलोग जितना देखे थे) उसको बनाने में कितना निमकी बनाना पड़ा होगा, कौन लगाता होगा इतना निमकी और पता नहीं क्या-क्या आला-गाजा।
एक बात और लगभग सभी ऑनलाइन प्लेटफार्म पर मैंने देखा कि नीम्बू की निमकी उपलब्ध है, सुन्दर डिब्बा में पैक करके और अंग्रेजी में इसका वर्णन करके इसको हज़ार रुपये किलो तक बेचा जा रहा है। क्या कहें, हज़म नहीं हुवा एकदम, भला ऐसा क्या कर दिए आप इसमें, कौन सा घीव लगा के बनाये हैं। वैसे भी, हम तो अपने लिए नीम्बू का अचार लगा लिए हैं, बेचते रहिये आप।
आप भी अगर नीम्बू के अचार के शौक़ीन है, तो फिर कमेंट बॉक्स में जरूर साझा कीजिये अपनी खटमीठ यादों को।
आर्टिकल: ऋतेश कुमार
सर्वाधिकार सुरक्षित: ठेठ पलामू
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