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Friday, March 18, 2022

पलाश की लाली...महुए की मादकता...फागुन की तरंग

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जब अहले सुबह आंख खुलते ही पलाश के फूल देखते ही मन मचलने लगे और दिल के तार झंकृत होने लगे तो समझो फागुन अपने उफान पर है। महुए के फूल की मादक खुशबू प्रभात की बेला में नाक के रास्ते मन तक पहुंच दिल को मदमस्त करने लगे तो तो समझो फागुन की तरंगें हिलोरें लेने लगी हैं। महुआ और पलाश के 'सुमन' बीच से निकलती हवा जब अलग 'रागिनी' छेड़ने लगे और चहुंओर जब आनंद छा जाए तो समझो रंगों का त्योहार दस्तक देने लगा है।
यही हाल अपना है। मेरे मित्रों का है। यूं कहें कि पूरे देश का है। जिन्हें मेरे गृह जिले पलामू और राज्य झारखंड की जानकारी है, वे पलाश व महुआ की सांस्कृतिक और आर्थिक महत्ता से भली भांति परिचित होंगे। इन दिनों चहुंओर पेड़ पर पलाश और महुआ के फूल पेड़ों पर लदे हैं। पलाश का फूल पेड़ पर अपनी खूबसूरती बिखेर रहा है। ऐसा लगता है कि पूरा इलाका भगवामय हो गया है। महुआ के फूल की खूबसूरती जमीन पर दिख रही है। जहां तक पेड़ फैला हुआ उसके नीचे सफेद चादर सी बिछी पड़ी है।
पलाश के फूल को सुखा कर गुलाल बनाया जाता है। बिलकुल प्राकृतिक आज की भाषा में आर्गेनिक। फूल को पानी में डाल कर छोड़ दें तो ऐसा रंग तैयार होता है कि रंगों से दूर रहने वाली भी कहे-रंग दे मोहे...। बसंत समाप्त होते ही पलाश पर लाह का लगना। फिर इन्हें उतारकर बाजार तक पहुंचाना। लाह से बनी 'लहठी’ नारी की कलाई पर आती है तो उसके सौंदर्य को बढ़ाती है। लेकिन जब लाह को पिघला कर 'मुहर’ लगाया जाता है बड़ी-बड़ी चीजें 'सील’ हो जाती हैं।
अब बात महुआ की। अभी सफेद, बिलकुल दूध की तरह, महुआ पेड़ पर है। सुबह में सूर्य की किरणों से पहले यानी प्रभात में ये फूल चूने लगते हैं। इन फूलों से बचपन की दो यादें जुड़ी हैं, एक खाने की तो दूसरी चुनने की। तब हम दोनों भाई मौका पाते ही पनेरीबांध चले जाते थे। पनेरीबांध से कोई पांच-सात किलोमीटर पर था माई (दादी) का ममहर खोहरी। यहां रहने वाले उनके भाई चंदरदेव बाबा दूध में सिझाया हुआ महुआ ला देते थे। अद्भुत मिठास होती थी इसकी। डालटनगंज में हमलोग प्रो. केएस अग्रवाल जी के मकान में रहते थे। सुबह हुई नहीं कि हम दोनों भाई, उनके दोनों बेटों राजू और संजय के साथ घर के पास के महुआ के पेड़ से सीजन की शुरुआत में फूल चुन लिया करते थे। शुरू में ये गिनती में होते थे जिन्हें हम छुपा कर रखते थे। सीजन खत्म होते-होते सभी कुछ किलो के मालिक हो जाते थे।
अपने इस अमूल्य खजाने को हम सभी पास की एक दुकान में बेचते थे। पांचवीं-छठी कक्षा में आते-आते ज्ञान चक्षु खुलने लगे और बंद हो गया महुआ चुनना। बाद में पता चला कि इस महुए का तो अलग ही अर्थशास्त्र है। फूल सूखने के बाद पशुओं को चारे के रूप में दिया जाता है तो इससे पारपंरिक शराब भी बनती है। तभी तो हमारे जिले में एक बात प्रचलित है-फलनवां, सहिए-सांझे महुआ चढ़ा लेले हऊ। फूल जब फल का रूप ले लेता है तो इसका महत्व और बढ़़ जाता है। इसके बीज से तेल निकलता है, जिसे डोरी का तेल कहा जाता है। इसका इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधन और डिटरजेंट बनाने में होता है।
कुल मिलाकर कहें तो महुआ और पलाश मेरे जिले की सांस्कृतिक धरोहर और आर्थिक संबल देने वाले हैं। आइए, इनकी खूबसूरती को निहारते हुए 'फगुआ’ के गीतों के साथ झूमें, उमंग और तरंग में डूब जाएं।।
© प्रभात मिश्रा सुमन
वरिष्ठ पत्रकार अमर उजाला नोएडा
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Friday, March 11, 2022

सेमल

विशाल वृक्ष,
रक्तिम पुष्प,
रुई के फाहों से अहलादित,
लट्टू बने फल के खोप्चे से आनंदित.
कभी किसी ने पलाश समझ खिंचाई की ,
किसी ने गुलमोहर समझ बड़ाई की,
पर वो खड़ा रहा बरसों से बस यूँ ही-
देसी भाषा में रचित अनगढ़ कविता की पंक्तियों सी,
भावनाओं से भरपूर पर अबूझ सी,
तकती रहीं उसकी शाखाएं -
गरम लू के थपेड़ों, अवरुद्ध बारिश की अविरल बूंदों औऱ सर्दी में ठीठुरते मनुजों को.
तकियों, लिहाफों में प्रस्फुट बच्चों की नींद की तरह-
सडक किनारे खड़ा अविचल छाँव है वो -
विशाल वृक्ष!
सेमल और कपास में अंतर है। कपास से सूत , सूत से धागे और धागे से सूती वस्त्र का निर्माण होता है. सेमल की रुई से फुलके तकियों के अलावा कुछ और बनाना ज़रा मुश्किल है। लेकिन इन मुलायम तकियों का एक अलग महत्त्व है. प्रताप नगर के आम बागान के आसपास वाले क्षेत्र सेमल के कई वृक्ष कई वर्षों से अचल खड़े हैं। हमारे ह्रदय में सुवासित 'पलामू-पन ' की तरह , बिना आसपास के बदलते परिस्थितियों की परवाह किये , इन्हें बस छाँव, आराम और सुकून देना ही आता है। यद्दपि नन्हे पक्षियों के प्रवासी बनने , पंख होते ही बड़े शहरों में पढाई लिखाई , रोजगार के लिए उड़ जाने के बावजूद , पलामू वासियों का 'पलामू-पना' नहीं जाता चाहे वो कहीं भी चले जाएं. आखिर ये 'पलामू-पना' है क्या ? कोई बहुत गूढ़ या विशिष्ट रहस्य नहीं है। अपितु बहुत ही सहज, बहुत ही साधारण चीज़ें हैं जो पलामू की धरती को नरम मुलायम रुधिर सी भूमी बन सींचती हैं.
वाक्या - तीन साल वयस होगी बच्ची की. आज से तीन दशक पूर्व ,अपने माता पिता संग दिवाली/धनतेरस की खरीदारी करने दुपहिया स्कूटर पर बैठ घास-पट्टी , सब्ज़ी मंडी से खरीदारी करने तीनों निकले थे। माँ उतर कर ऊँचे किराना दूकान पर समय बचाने के लिए पहले ही उतर गयीं। बच्ची को उसके पिता ने कहा, " जाओ अपनी माँ के पास,मैं स्कूटर को सही जगह बना कर लगा कर आता हूँ।" बच्ची आज्ञाकारी थी, बिना झिझक के वह कुछ कदम चल अपनी माँ की हरी साड़ी का पल्लू पकड़ खड़ी हों गयीं. शायद इतने छुटपन में उसकी निगाहें उस महिला के चेहरे तक ना जा पायी. 2 मिनट बाद अनिभिज्ञ, अनजान महिला आगे बढ़ गईं. वो बच्ची कोलाहल में अचानक गायब हों गयीं उन माँ जैसी महिला का पीछा भी नहीं कर पायी. फिर नन्हे मस्तिष्क ने जाने क्या समझा बूझा , बच्ची भी आगे बढ़ने लगी. इतनी भीड़ थी की इंसानों को भी पैदल चलने में असुविधा हो रही थी. इतने में जाने कहाँ से 2-3 गईया, सब्ज़ी वालों के कचरे से अपना भोजन ढूंढती दिख गईं. आम तौर पर ये बड़ा ही साधारण दृश्य होता है, भयंकर भीड़ में उन मासूम किन्तु जिद्दी मवेशियों की उपस्थिति. साढ़े तीन साल की बच्ची को डराने के लिए ये विहंगम दृश्य पर्याप्त था. कुछ दूर यूँ ही घिसट के चलने के बाद थोड़ी खाली जगह देख वो एक आलू वाले के पास रोनी शकल लिए खड़ी हों गयीं.
उधर बच्ची के अभिभावक बुरी तरह डर गए थे. पूरी सब्ज़ी मंडी, महावीर मंदिर तक देख आये, कंठ अवरुद्ध हों गए, भय से चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी थी.
उधर छोटी बच्ची को एक आलू वाले ने सुबकते देख लिया था. सफ़ेद खद्दर के धोती, कुर्ते, पगड़ी पहने छः फुट के मुस्लमान आलू वाले ने यह भाँप लिया था की बच्ची खो गयीं है. दुलार से उसे पुचकारते हुए, अपनी सब्ज़ी के टोकरियों को बोरे से ढांप, पडोसी कुंजड़े को ध्यान रखना बोल वो तुरंत बच्ची को अपने कंधे पर बिठा निकल पड़ा. काबुलीवाले औऱ मिनी के सामान ही दोनों में एक अस्फुट जुड़ाव हों गया. तभी तो बच्ची ने सुबकना छोड़ दिया था. इस पूरे घटनाक्रम में मुश्किल से 15 मिनट निकले होंगे पर दुनिया उलट पुलट सी प्रतीत हों रही थी.
कुछ ही पलों बाद बच्ची के माँ बाप दृष्टिगोचर हों गए. आलू वाला पिताजी को देख सकपका सा गया. क्यूंकि ये वही महानुभाव प्रोफेसर साब थे जिन्होंने उसकी सुपुत्री को गत दिनों ना सिर्फ इंटरमीडिएट में दाखिला दिलाने के लिए उसको औऱ उसके परिवार वालों को राजी किया था बल्कि फीस भी अपनी जेब से दे डाली थी . कर्मा चक्कर लगा वापस उसी धुरी पर पहुंचा देता है. उसी आलू वाले को प्रोफेसर साहब की बेटी की जान बचाने, वापस घर पहुँचाने का मौका मिलना था. आज ऊपर वाले ने देश, समाज, जाति की संकीर्ण चारदिवारी से परे हट मानवता की एक अलग शिक्षा दी थी. उस अभिभूत करने वाले पल ने माँ बाप, बच्ची, आलू वाले औऱ उस पूरे धनतेरस वाली ठेलमठेलम भीड़ को किंकर्त्तव्यविमूढ कर डाला.
सेमल बेहद साधारण पर कई मायनों में विशिष्ट पेड़ है. पलामू भी!
1. अपनी तीन दशक से कुछ ऊपर के जीवन में मैंने कभी यहाँ जातिगत दंगे, विवाद होते नहीं देखा ना सुना. कोएग्जिस्ट करने की इसी आदत ने हमें कोस्मोपोलीटन बना दिया है.
2. गुरुजनों का यहाँ विशेष आदर मान है, रुतबा किसी कलेक्टर से कम नहीं है. गुरु को गोविन्द से कम ना समझना एक अलग प्रकार की विशिष्टता है.
3. बिजली की कटौती, पानी की समस्या, मच्छर, काफ़ी सारी बुनियादी समस्या हम लोगों ने सामान्य शहरों से थोड़ा अधिक ही झेली है, पर इसी सहनशीलता ने ही तो हमें हर मुसीबत से डट कर मुक़ाबला करना सिखाया है.
4. संतुष्टि- जहाँ आजकल की दुनिया में आपातकाल समझ कर अत्रिप्त् आकांक्षाओं के पीछे भागते मनुष्य ही ज्यादा रहते हैं, पलामू वासियों ने महत्त्वकांक्षा रखना, सपनों को पूरा करने के लिए जतन करना तो सीखा ही, पर अंत में संतुष्ट हो थमना भी सीखा है.
5. मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या गिरजाघर, ईश्वर के किसी भी निवास स्थान के बाहर से गुजरते हुए सर झुकना, हाथ जुड़ना या क्रॉस बना श्रद्धा पूर्ण व्यवहार भी एक बानगी है |
सेमल की तरह पलामू - पना बहुत साधारण होते हुए भी काफी विशिष्ट गुण है. इसपर आपका क्या विचार है?
©शिवांगी
May be an image of text that says "सेमल palamu thaln © शिवांगी"

Friday, March 4, 2022

जा ई इहई छूट गए

 

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एक बार हुआ क्या कि घरे से चाचा चाची के प्लान बना कि मामा घर जाना है। अब सबे घर के लईकन जईसन, हमरो उहे हाल था। बड़े चाचा थे हमारे वो माई पापा से ज्यादे ही हमको मानते थे। अब जब मामा घर जाने के प्लान बना तो हमरो से कहल गया कि चलबे का? तो हमरा कहाँ देरी था, हमहूँ रेडी। जाए के दिन तनी जल्दही रेडी होके, दशहारा में जे लियाईल कपड़ा था उहे पहिन के तैयार थे। सब के गोड़ उड़ लाग के एकदम साईकिल में बैग लदा गया। हमहूँ साईकिल के कैरियर पर आगे बैठ के रोड पर आ गए। काउंटर पर के कन्हाई साव के चाय दुकान में चाय निमकी खाये और गाड़ी के आसरा देखने लगे। सब बैठ के बार बार पूछे कि" इनको जाए लाबा का? "
हम अलगे परेशान कि मर-तेरी! तैयार हो के आइल ही जाहिंला न, आऊ ई सब कहैत हथ कि इनको जाना है? ईसब मने हल्का में लेवैत हथिन का हमरा? नया कपड़ा जूता मोज़ा सब, का मुँह देखेला पहिन के आईल ही?
अब बस आने के टाईम हुआ ओइसहीं सब प्लान बनाना चालू कि जइसहीं बस आएगा पहिले चाची चढ़ जाएंगे फिर सब बैग चढ़ाना है फिर चाचा बैठेंगे। हम तुरंत पूछ दिए कि- "आऊ हम जे"। तब ओने से कन्हाई साव कहे कि-" हँ उसके बाद आपको चढ़ा देंगे पंडीजी" , इतना सुने तब जा के खुशी हुआ।
अब बस आया। सब एकदम हड़बड़ा गए… जल्दी जल्दी के चक्कर मे। चाची चढ़ गई, तुरन्त दूनो बैग चढ़ गया। चाचा भी चढ़ गए । अब बस वाला बढ़ाने लगा.. अब हमर अकबकी अलगे कि हम चढ़ बे नहीं किये ई बढ़ा कैसे रहा है , कुछ समझ में आता ओकर पहिलहीं कन्हाई साव गोदी में उठा के दौड़ने लगे। बस बढ़ा दिया और ई पीछे कुछ दूर तक हमको लेके दौड़ रहे हैं और कह रहे हैं - " अरे रुकिए रुकिए एक सवारी छूट गए , छूट गए ।" अब बस काहेला रुके जाओ। हम रोना चालू आऊ बस वाला पर गोसा रहे हैं। तब तक ओने से पापा साईकिल लेके आये और पूछे कि "का होलाई ? काहेला रोवाईत हे । तब कन्हाई साव बताये कि का बात हुआ सो । अब इतना सुनते पापा एकदम ताव से कि रुक तो सार छोड़ के भाग गया बस वाला , आव बैठ तो साइकिल पर हमीन साईकिले से जल्दी पहुँच जाईब। हमहूँ ताव से बैठ गए पीछे एकदम सीट पकड़ के । साईकिल चला और हम ख़ुश। 10 मिनट में अगला मोड़ से होते हुए देखे कि घरे वापस पहुँचा दिए। घरे आये मुँह लटकाए रहे। लेकिन गोसा तो बस वाला पर तब से जब तक ईयाद रहा तब तक रहा। लेकिन जब से बात बात में असली मैटर पता चला तब से कन्हाई साव से तो और जादे गोसा हो गया।लेकिन उ लईका के उमंग और कहीं साथे जाए कि ललक। अब कहाँ, अब तो घरे से कहल जाता है तबो आदमी जा नहीं पाता है। आपलोग के भी अईसन कुछ हुआ है का तो बताइयेगा जरूर। वैसे कहानी खाली हम लिखें है लेकिन असली पात्र हमर भाई विधु बाबू थे।
आनंद केशव "देहाती"
May be an image of text that says "आनंद केशव 'देहाती' ठेठ पलामू"





Tuesday, March 1, 2022

यादों के सिलसिले

 सर्दी की सुबह आमतौर पर तो धुंध , बादलों और हलकी ठिठुरन से ग्रस्त रहती हैं. लेकिन अब ऐसी सुबह हमारे शहर के एकलौते छोटे एरोड्रोम की जलवायु के लिए गुलाबी ठंडक और बासंती ब्यार में लिपटे मद्धम सूर्य की रौशनी में नहाने का पर्व सा है. एरोड्रोम और एयरपोर्ट में एक बारीक किंतु गहरा फ़र्क़ होता है। एरोड्रोम सिर्फ छोटे विमानों/हेलीकाप्टर के उतरने और उड़ने की तात्कालिक व्यवस्था मुहैया कराती है (बहुत कुछ मेरे सुबह की सैर में आते जाते विचारों की तरह ) एयरपोर्ट का मतलब पूरी हवाई ट्रैफिक के सञ्चालन , विमानों के आवागमन , यात्रियों की सुविधा हेतु बनवाये गए कई प्रावधानों का एक जगह पर होना है. यद्यपि कुछ एक साल पहले हमारे मासूम, आडंबरहीन हवाई अड्डे को अच्छे खासे एयरपोर्ट में बदलने की बात चली थी , पर फिर वो मासूमियत और कुछ अंदरूनी संवेदनाओं का क्या होता? अच्छा हुआ कुछ नहीं हुआ। जो होता है , अच्छा ही होता है। ५-स्टार चॉकलेट के विज्ञापन की तरह 'कभी कभी कुछ नहीं करना भी बहुत अच्छा होता है).

हम सब लोगों ने जिन्होंने भी दुपहिया चारपहिया वाहन चलाना सीखा है , अगर चियांकी हवाई अड्डे पर रोज़ कुछ चक्कर नहीं लगाए तो वाहन चलाना क्या सीखा ? कहीं और वाहन चलाना सीखने और हवाई अड्डे पर सिखने में काफी फ़र्क़ होता है. खुली , खाली सड़क के ऊपर ऊँचे गियर में ऊँची गति से गाड़ी उड़ाने (चलाने ) से ले कर अनगिनत गड्ढो के मध्य से विनय से ओत-प्रोत दूसरे गियर में २५ की गति का दामन थामे रखने तक का अनुभव सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है।ऊबड़खाबड़ रास्तों पर चलने से आप अपने सुखी संसार से उचक के कुछ समय के लिए अचानक जागृत हो जाते हो , जीवंत भी ,और ज्यादा ज़िंदा भी। मेरे लिए इन तथ्यात्मक पहलू के अलावा भी इस स्थान के कई मायने हैं.
पृष्ठभूमि काफी रोचक है इस जगह की. एक तरफ जहाँ अपने कैशोर्य की अंतिम वर्षों को पूरा करते उत्साही बच्चे अपनी दुपहिया को हवा की गति से उड़ाते , अपने जैसे और दुबले पतले २-३ मनुष्यों को बिठा नायकगिरि की नयी बुलंदियों को छूते दिख जायेंगे तो दूसरी तरफ नव-धनाढ्य अपनी उम्र के दूसरे, तीसरे, चौथे दशक में पहुँचते हलकी काया ,उभरते तोंद वाले कुछ मनुष्य अपनी क्रिकेट कला को प्रदर्शित करने और तंदरुस्त रहने की दिशा में चहलकदमी करते दिख जाते हैं. यद्यपि मैंने उनमें से किसी को भी खड़े रहने , गपियाने और यदा कदा ५ कदम प्रति मिनट के हिसाब से दौड़ने के अलावा कुछ करते नहीं देखा है. २६ जनवरी के आसपास पहली बार चूने से उनके खाली मैदान (-हवाई अड्डे की पक्की सड़क से इतर ) पर कुछ सुर्ख घेरे बनाते देखा. कह नहीं सकती की वो गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में कुछ कार्यक्रम हेतु था या फिर एक और सहज प्रपंच !अपने ढाई किलोमीटर सुबह की सैर और कुछ चक्कर वाहन-सीखो अभ्यास के बाद मैं इस उम्मीद में थी की झंडोतोलन करके हमलोगों को भी लड्डू जलेबी मयस्सर होंगे, किन्तु अफ़सोस ऐसा हो न सका , या शायद मैं जल्दी वापस लौट आयी होंगी। नाउम्मीद क्यों होना है ? बहरहाल मेरी परेशानी क्रीड़ा करते मनुष्यों की ख़ुशी नहीं , कुछ और ही है.
जो थोड़ा आराम और बहुत काम करते हैं वे कभी नहीं कहते कि उन्होंने बहुत किया। अति का भला न बरसना , अति की भली न धूप , अति भला न बोलना , अति भली न चुप ! कुछ कुछ ऐसा ही सुना था मैंने बचपन के किसी हिंदी व्याकरण की पुस्तक में. यदि कोई कहे कि उन्होंने बहुत काम किया, तो अर्थ है कि वे और कर सकते हैं; पूर्ण रूप से नहीं किया। काम करने से इतनी थकान नहीं होती जितनी कर्तापन के भाव से होती है। पूरी तरह कर्म करने में रहना चाहिए , कर्तापन के भाव से रहित होकर। इससे पहले की मेरे से व्याकरण की बद/खुश बू साफ़ साफ़ आनी लगे, मैं मुद्दे की बात पर आती हूँ.
एरोड्रोम की एक चारदीवारी को सांझा करती उस विद्यालय की प्राचीर है जहाँ मैं अपने जीवन के १२ साल व्यतीत किये हैं. पढ़ना , लिखना , जीना - काफी कुछ सीखा है वहां से। कोरोना काल की समाप्ति के बाद थोड़ी तेज़ , थोड़ी न्यून होती , सुबह की सभा की आवाज़ मुझे सामीप्य , अपनेपन , आत्मविश्वास - जाने क्या क्या का आभास करवाती हैं. ब्रिस्क वाक के दौरान ह्रदय और दिमाग की गति एक सी हो जाती हैं , तेज़ , बहुत तेज़. मेरी परेशानी ये है की क्रिकेट खेलती दो दर्ज़न आँखें कुछ ज्यादा ही धीमे चलती गाडी को अवश्य ही पहचान गयी होंगी और उतनी ही जोड़ी जुबानों ने आपस में जाने क्या क्या बातें की होंगी। न तो मैं उनकी बातें सुन सकती हूँ , न ऐसा कुछ करने की इच्छा है. बस ये की बच्चों के मधुर प्रार्थना के स्वर मुझ तक पहुँचने में थोड़ी कठिनाई होती है. इस बात के दोषी पूरी तरह से वे नवीन खिलाडी नहीं है , मेरे क़दमों की बढ़ती घटती गति भी तो है.
जाने क्यों एक युवक रोज़ कुत्तों के संग कुछ ज्यादा ही अंतरंगता दिखाता है , उनके साथ हल्का फुल्का टहल लेने के पश्चात् ठीक हेलीपैड के गोले के बीचोंबीच सड़क पर बैठ उनको बिस्कुट खिलाता है , उनके संग सेल्फी लेता है - कह नहीं सकती की ये एक ट्रेंड है ( पशु प्रेम प्रदर्शन) या फिर खोपड़ी की गड़बड़ी. काफी अनुत्तरित प्रश्न भी हैं। आसपास के चियांकी गांव के कुछ ग्रामीण अपनी गऊ-शाला , बकरी-शाला का सञ्चालन भी एरोड्रोम की असंरक्षित भूमि से करते हैं. चलने के लिए बने फुटपाथ से बिलकुल सट के सूखते उपलों /गोयठे की श्रृंखला जो शुरू होती है वो उन मासूम गायों के बाड़ों की परिधि तक पहुँच जाती हैं. अगर कोई बड़े शहर वाला सूंघ ले तो शायद उबकाई आ जाये गोबर , चारों की महक से. लेकिन मेरी देहाती नासिका को ये खुशबू से कम नहीं लगते. शायद कुछ कोशिकाओं में गोयठे के धूँअन से ओतप्रोत बंगीय दुर्गा बाड़ी का चित्र इतनी गहरी पैठ बनाये हुए है की नासिका बस वही सूंघना चाहती है. यादों के काफिले में सरकारी हस्तकरघा,हस्तकला उद्योग में कार्याधीन ढाई वर्षों के दौरान व्यतीत वो पल भी बसे हुए हैं जब कार्यशाला के सिलसिले में आसपास के ग्रामीण घरों के चप्पे चप्पे से मैं वाक़िफ़ थी। मेरे सत्कार में,कभी ये बोलने पर की मैं चाय नहीं पीती , गाय का ताजा दुग्ध लोटे में परोसा जाता था। बिता हुआ पल वापस नहीं आता. अब शहर में ताज़ा दूध मिलना मुश्किल ही होगा औऱ 10 वर्ष पहले की बात है, तो मैं चाय कॉफ़ी धड़ल्ले से पीती हूं, कभी कभी अंधाधुंध संख्या में भी!
मेरी सुन्दर यादों के सिलसिले को दो विचारों ने एक साथ तोड़ डाला. जूते पहन कर तो चलती हूं, पर मेरे कदम कुछ नुकीली वस्तु से टकराये... गौर से देखने पर धूप की रौशनी काफ़ी सारी कांच को दीप्ती प्रदान कर रहे थे. ये कुछ औऱ नहीं टूटी मदिरा बोतलों के टुकड़े हैं जो करीब करीब पूरे हवाई अड्डे के किनारों में फैले हुए हैं. ये सोच कर मन काफी दुखित हुआ की पता नहीं वो लोग कैसे, कौन होते हैं जो ज़हर के बोतल उदरस्थ कर अपने आप को शूरवीर समझते हैं! टूटी कांच की किरिंचे काश उन्हें आत्म बोद्ध करवा पाती.
दूर रम्भाती एक गाय की पुकार की तरफ देखने पर मेरा ध्यान दुबली पतली काया धारिणी एक षोडिशी के गोयठे थापते कुशल हाथोँ पर भी गया. आसपास के इतने रंगीन वायुमंडल की हलचलों से अनजान अपनी भूरी गईया को ताकती बस वो थालीनुमा आकार बनाना ही जानती थी, दो वक़्त की रोटी जुगाड़ना, पशुमल से माल्यवान बनाना भी शायद जानती थी.
जाने क्यूँ बेवजह विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले साइन थीटा , कॉस थीटा, कैलकुलस, आर्गेनिक केमिस्ट्री , जुलियस सीज़र शेकसपेयर की रोमन अंग्रेज़ी से उलझते अपने सोलह बरस वाले दिमाग़ की याद आ गयी. काश कुछ जीवन पाठ आसपास की आवोहवा से सीखना भी सिखाया गया होता. कोरोना काल में कांच के सामने बिना मेकअप, बिना बनाव छिपाव के बस सीधा खड़ा होना सीख गए हम, काश ऐसे ही कुछ जीवन पाठ स्कूलों में सिखाया गया होता तो ज्यादा तैयार, ज्यादा सीधी रीढ़ के साथ खड़े हों सकते हम. सब कुछ मेरी सोच है औऱ कुछ नहीं.
©शिवांगी
May be an image of text that says "चियांकि हवाई अड्डा यादों की उड़ान � शिवांगी ठेठ पलामू"