Home

Sunday, February 21, 2021

मनोहर पोथी



दिवाली की सुगबुगाहट ने दीवारों की नींद उड़ानी शुरू कर दी है. घरों में सफाई अभियान शुरू होते ही यादों ने एक करवट ले ली. छ्त की सफाई करते हुए एक टोकरी धम्म से गिरी और आँखों के सामने आ गिरा एक पन्ना जिसपे मेरी बचपन की कहानी फ्रेम दर फ्रेम छपी थी.

कोई ६-७ साल का रहा होऊंगा जब साप्ताहिक बाज़ार से खरीदारी कर के मेरे दोस्त को, जो खाली टाइम में चरवाहे का भी काम करता था, उसके दादाजी ने मनोहर पोथी दे दिया था. मारे ख़ुशी के भागता भागता वो मेरे पास आया था. और फिर भागते भागते हम खलिहान में पुआल की ढेर के ऊपर पहुँच गए. वहां बैठ हम पन्ने दर पन्ने, चौखुट बक्सों में कैद तस्वीरों में डूबने लगे और कल्पना का समंदर अपनी लहरों के संग हमें बहा कर ले जाने लगा.

चल घर चल...
नटखट मत बन...
झटपट मत कर ...
मोहन जा...
उधर मत जा...
राधा खाना खा ...

इन शब्द समूहों को पढ़ लेने पर जो आनंद और अभिमान की अनुभूति होती थी वो जावा और विसुअल सी की कोडिंग समझ के भी नहीं होती है अब.

जेहन में कैद ये शब्द बार बार वहीँ खींच ले जाते हैं जब २ रुपये की मनोहर पोथी और उसके चित्र ही हमारे लिए शिक्षा के एकमात्र शौक थे. खास बात ये कि आस पास के सभी हाट-बाज़ार और किराना दुकानों में भी पढाई लिखी की सामग्री के नाम पर डिप्लोमा कलम और जिस्ते वाले कागज के साथ यही एकमात्र किताब मिलती थी. और तक़रीबन हर मजदूर तबके का बाप अपने बच्चे को यह किताब जरुर देता था इस उम्मीद से कि उसके बच्चे को आगे चल के मजदूरी न करनी पड़े. मनोहर पोथी से उनकी इतनी उम्मीद थी!

आज की तरह भारी भरकम बस्ते की जगह काश कि हम फिर से उस हलके नाजुक मनोहर पोथी के दुसरे पन्ने में खो जाते जहाँ 'क' से 'कबूतर' शुरू होता था या फिर आखिरी से ठीक पहले वाले पन्ने में जहाँ वो प्रार्थना लिखी होती थी - " ............"
1 Nov 2018, 23:44

No comments:

Post a Comment