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Sunday, February 21, 2021

होरहा




बूट के साग के बाद बच्चा पार्टी को '#झंगरी' और '#होरहा' का इंतजार होता है। सरस्वती पूजा तक कहीं-कहीं झंगरी मिलने लगता है। होली तक तो बिल्कुल तैयार हो जाता है। झंगरी में से चना तोड़ के खाए हैं, पर #खटुरस लगता था ,तो ओकरा धोकर खाते थे। बढिय़ा गोटाइल (#गदराईल) दाना वाला झंगरी के नीचे आग जला के होरहा भूंजल जाता था। बूढ-पुरनिया का का कहना था कि 'होलरी' के आग में झंगरी #झऊंस के तबे नेवान करना चाहिए। पर ये सब भाषण हमनी पर कहाँ लागू हो पाता। जब मन किया आग लहका के हम झंगरी के 'होरहा' भूंज लेते। ओह समय #करिखा लगने का चाहे हांथ मइल होने का डर तो था नहीं।

'होरहा' के बूट बड़ा #सोंधा लगता है, वो स्वाद भूले नहीं हैं अभी भी। हालांकि अब बड़ी मुश्किल से परंपरा के नाम पर 'होलिकादहन' के दिन दू चार दाना 'होरहा' के मुंह में डालते हैं। एक एकगो चना के झंगरी में से बूट निकालने का अब समय भी नहीं और अब के बूट में उ स्वाद भी नहीं। काल्हे हरा चना झोला में लटका के बेचत देखे। झोला के नीचे से पानी चू रहा था। मतलब कि वजन बढ़ावे खातिर पानी डाला गया था उसमें। त ओइसन बूट में स्वाद का रहेगा। अब के किसान लोग बड़ी प्रोफेशनल हो गया है और बड़ी चालाक भी। छोटका हरा चना अब मिलता कहाँ है। घोड़ा के खाए वाला #हाईब्रिड चना लेके घूम रहा है सब। आपन जमाना के छोटका हरियर बूट में मिठास था। खाली हरियर मिचाई आउ जीरा के फोरन पर भूंज देते तो बेजोड़ स्वाद आता था।अब उ सब स्वाद सपना हो गया । केतनो हरियर बूट के व्यंजन (सब्जी, हलुआ, बर्फी, खीर, कोफ्ता, कटलेट) बना लें पर असली स्वाद त "झंगरी" आऊ "होरहे" में था।

Sharmila Shumee
21 Feb 2019, 05:35

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