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Wednesday, July 11, 2018

फूलोरही

रक्षा-बंधन और भैया दूज (गोधन) के अलावा भी हमारी पलामू की संस्कृति में भाई-बहनों का एक प्यारा सा त्यौहार है, जिसे अब हम भूल चुके हैं और यह विलुप्त होने के कगार पर है! फूलोहरी। या फूलोरही। जी हां यही नाम है।

यह पर्व नवरात्री के वक़्त मनाया जाता है। चाची से पूछे कि कब शुरू होता है तो बोली कि, "कलश स्थापना के ठीक एक दिन पहिले यानि अमावस्या के दिन डाली न्यौताला, आउ ई सात दिन तक चलेला।"

गाँव भर की सभी लड़कियाँ या उनका समूह एक ही जगह जमा हो के शिव ज़ी के संपूर्ण परिवार की छोटी छोटी मूर्ति (वेदी) बनाती हैं, और रोज उनकी पूजा करती हैं।

बहिन सब एके साथे भोरे-भोरे उठ के डलिया ले के फूल-लोहरने मने फूल चुनने जाती है। एक ग्रुप आउर दोसर झुंड में कंपीटिशन भी रहता है कि के जादे फूल जामा करे पारता है। जे जादे फूल जामा किया उ अपन भाई के जादे मानती है। फिर वही चुन कर लाया हुआ फूल से शिव जी की पूजा होती है।

रोज साँझ के साँझ सब सहेलियां मिल के शिव जी के खास गीतों को गाती हैं और झूमर भी खेलती है, जो कि हमारे पलामू समाज की परम्परा है। सभी सहेलियां उपवास रखती हैं या कुछ सात्विक भोजन जैसे दूध-फलाहार इत्यादि पर रहती हैं। पुरे गाँव में खुशी का एक अलग सा माहौल रहता है।

प्रतिदिन सबकोइ अहरा या नदी में नहाने जाते हैं। वहीं अहरा-पोखरा जैसी सांकेतिक आकृतियों का निर्माण होता है, यह दरअसल एक किला जैसा होता है। किला निर्माण कर पहले उसकी पूजा की जाती है, फिर बहनें अपने भाइयों की पूजा करती है और उनके दीर्घायु और सफलता की कामना शिव जी से करती हैं। फिर उस निर्माण को भाई अपने पैरों से कुचल देते हैं। इस कुचलने का अर्थ यह है कि भाई के जितने भी दुःख- कष्ट थे, सब की किलेबन्दी बहन ने कर दिया था, और अब उसे भाई ने कुचल दिया। ये दिखाने के लिए भी कि बहन तुम्हारी जिंदगी में भी जो कुछ दुःख हैं उनके बारे में हम भाइयों को बताते रहना और हम इसी तरह उन दुखों को कुचलते जाएंगे।  ख़ास कर अंतिम दिन तो पूरा गांव बैंड-बाजा लिए एक साथ विसजर्न के लिए जाता है। पुआ-पकवान में खास तौर पर दुधौरा-केरा-दुधौरी भी बनता है। नदी में पूजा के बाद लोग सपरिवार वहीं पर पकवान खाते हैं, आजकल के किसी पिकनिक आयोजन की तरह। यह आयोजन एक खेल जैसा लगता है, लोग खूब मजा करते हैं। परन्तु यह खेल और रिवाज के साथ साथ एक संस्कार भी है जो दिखाता है कि हमें एकजुटता से रहना चाहिए और सभी बड़े से बड़े दुखों-कष्टों का सामना मिलजुल कर करना चाहिए।

वैसे तो यह त्योहार पलामू के कुछ ही गांवों में मनाया जाता था मगर दुःख इस बात का है कि अब यह विलुप्त होने के कगार पर है। मेरी आजी बांसदोहर की है. वह इस परम्परा को मेरे गांव में अपने मायके से लायी थी और मेरे गाँव में यह तकरीबन 85 साल से ये मनाया जा रहा था, परन्तु पिछले 3 वर्षों से यह बंद है। पुरुबडीहा के मेरे मित्र दया भाई ने भी बताया कि अब उनके गांव में भी नहीं मन रहा है। सिंगरा-बनपुरवा में भी इस त्यौहार को मनाया जाता था लेकिन अब वहां भी बंद होने के कगार पर है।

एक ओर जहाँ सब टीवी-सिरियल देख के गोड़ में करिया डोरा बांधने लगे हैं, चलनी से देखे वाला करवा चौथ मनाने लगे है, दुनियाभर के लंद- फंद डे सेलिब्रेट करने लगे हैं वहीं दूसरी ओर हम अपनी परम्पराओं को क्यों भूल रहे हैं? हमारा सामाजिक विघटन हो रहा है क्या? आखिर क्यों यह सामाजिक एकता वाला त्यौहार विलुप्त होने के कगार पर है?

© Sunny Shukla

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